शरद पूर्णिमा पर छत्तीसगढ़ के मां मानकेश्वरी मंदिर में अनूठी परंपरा, 100 से ज्यादा बकरों की बलि के बाद बैगा ने किया रक्तपान, मन्नत पूरी होने पर चढ़ाया जाता है बकरा

Raigarh Karmagarh Mankeshwari Temple Tradition: छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य रायगढ़ जिले में शरद पूर्णिमा के अवसर पर आस्था और प्राचीन मान्यताओं का अनूठा संगम देखने को मिलता है। जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर जंगलों के बीच बसे गांव करमागढ़ में स्थित मां मानकेश्वरी मंदिर में सदियों पुरानी बलि प्रथा निभाई गई। यहां शरद पूर्णिमा के दिन देवी को बकरों की बलि अर्पित की जाती है। बलि की रस्म के बाद मंदिर का मुख्य बैगा पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर नृत्य करते हुए बलि के बाद निकले रक्त का पान करता है। स्थानीय निवासियों के अनुसार यह परंपरा लगभग 500 वर्षों से निरंतर चली आ रही है।

राजपरिवार की कुलदेवी मानकेश्वरी

500 Years Old Goat Sacrifice Tradition CG: रायगढ़-हमीरपुर मार्ग पर ओडिशा सीमा के पास स्थित मां मानकेश्वरी का यह धाम आदिवासी समाज और स्थानीय निवासियों की अगाध आस्था का केंद्र है। मां मानकेश्वरी को रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी माना जाता है। इसी कारण हर साल शरद पूर्णिमा पर राजपरिवार के सदस्य विशेष पूजा-अर्चना के लिए यहां पहुंचते हैं। इस अवसर पर मंदिर परिसर में विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें ओडिशा और आसपास के गांवों से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

पहली बलि से शुरुआत

Raigarh Royal Family Kuldevi Temple: मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत रायगढ़ राजपरिवार की ओर से की जाने वाली पहली पूजा और पहले बकरे की बलि से होती है। इसके बाद ही आम श्रद्धालुओं द्वारा लाए गए बकरों की बलि प्रक्रिया शुरू की जाती है। मान्यता है कि मां मानकेश्वरी के दरबार में मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है। संतान प्राप्ति, परिवार की सुख-समृद्धि और विपत्तियों से रक्षा की मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु अगले साल शरद पूर्णिमा पर बकरा और नारियल चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं।

महिलाओं को मिलता आशीर्वाद

Karmagarh Baiga Shyam Lal Sidar News: विशेष पूजा के दौरान मुख्य बैगा ढोल और नगाड़ों की थाप पर नृत्य करता हुआ मंदिर परिसर में प्रवेश करता है। इस दौरान सैकड़ों की संख्या में महिलाएं जमीन पर दंडवत लेटकर बैगा से आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। नृत्य करते हुए बैगा जिन महिलाओं के सिर पर स्पर्श करता है, उसे सीधे देवी का आशीर्वाद माना जाता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस विशेष अनुष्ठान के दौरान बैगा के शरीर में स्वयं देवी मां विराजमान होती हैं।

अंगूठी कसने का संकेत

Sharad Purnima Raigarh Tribal Festival: मंदिर की परंपरा से जुड़ा एक अनूठा पहलू यह भी है कि शरद पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर देवी का आगमन ओडिशा से करमागढ़ होता है। अगले दिन मुख्य बैगा द्वारा विशेष पूजा संपन्न की जाती है। पूजा के दौरान राजपरिवार के सदस्यों द्वारा बैगा के अंगूठे में एक ढीली अंगूठी पहनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि पूजा के दौरान जब अंगूठी अपने आप अंगूठे में कस जाती है, तो इसे बैगा के शरीर में देवी के प्रवेश का संकेत माना जाता है।

बैगा श्यामलाल ने संभाली कमान

इस वर्ष मंदिर में मुख्य बैगा के रूप में श्यामलाल सिदार ने पूजा-अर्चना और अनुष्ठान की जिम्मेदारी संभाली। इससे पूर्व गांव के वरिष्ठ बीरबल सिदार लगातार 35 वर्षों तक मुख्य बैगा के रूप में यह दायित्व निभाते आ रहे थे। पूर्व बैगा के अनुसार पूजा के दौरान एक अलग आध्यात्मिक शक्ति का अहसास होता है और ढोल की थाप पर नृत्य करते समय वे पूरी तरह से देवी की भक्ति में लीन रहते हैं।

श्रद्धा से पहुंचे श्रद्धालु

करमागढ़ का यह वार्षिक आयोजन क्षेत्र के लोगों के लिए बहुत महत्व रखता है। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को देखने और देवी का आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं। बलि प्रथा और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद श्रद्धालु मेले का आनंद लेते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि इस पूजा से पूरे क्षेत्र में सुख-समृद्धि बनी रहती है और गांव किसी भी प्राकृतिक आपदा से सुरक्षित रहता है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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