
दिवाली का त्योहार एक दिन का नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलने वाला पर्व है। इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है। इसके अगले दिन नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली और फिर कार्तिक अमावस्या को मुख्य दिवाली मनाई जाती है। इन तीनों दिनों में पूजा-पाठ और रीति-रिवाज अलग-अलग होते हैं। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा, छोटी दिवाली पर अभ्यंग स्नान और यम दीपदान, जबकि दिवाली की रात माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की आराधना की जाती है। आखिर इन त्योहारों का यही क्रम क्यों है और इनके पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं? आइए जानते हैं।
दिवाली से दो दिन पहले क्यों मनाई जाती है धनतेरस?
Dhanteras 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार, धनतेरस कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाई जाती है। इसे धनत्रयोदशी भी कहते हैं। इसके अगले दिन चतुर्दशी और फिर अमावस्या आती है। इसी पंचांग क्रम के कारण धनतेरस मुख्य दिवाली से दो दिन पहले पड़ती है।
इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता में धनतेरस को धन और समृद्धि के साथ अच्छे स्वास्थ्य की कामना का पर्व माना गया है। इस दिन सोना-चांदी, बर्तन और दूसरी उपयोगी वस्तुएं खरीदने की परंपरा भी है।
समुद्र मंथन से कैसे जुड़ी है धनतेरस की कथा?
Samudra Manthan: धनतेरस से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथा समुद्र मंथन की है। श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में समुद्र मंथन और भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने का वर्णन मिलता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था। इस दौरान कई दिव्य रत्न और वस्तुएं निकलीं। इसी मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।
धार्मिक परंपरा में भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। इसी वजह से धनतेरस पर उनकी पूजा की जाती है। भक्त इस दिन अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना करते हैं।
धनतेरस के अगले दिन क्यों मनाई जाती है छोटी दिवाली?
Narak Chaturdashi: कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी, छोटी दिवाली और रूप चौदस कहा जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध किए जाने की कथा प्रचलित है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कंध के 59वें अध्याय में श्रीकृष्ण और नरकासुर के युद्ध का वर्णन मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, नरकासुर ने कई राजकुमारियों को बंदी बना लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध कर उन्हें मुक्त कराया था। नरक चतुर्दशी को इसी विजय की याद से जोड़ा जाता है।
इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले तेल और उबटन लगाकर स्नान करने की परंपरा है। इसे अभ्यंग स्नान कहा जाता है। शाम को यमराज के नाम पर दीपक जलाने की भी परंपरा है, जिसे यम दीपदान कहते हैं।
अमावस्या की रात ही क्यों होती है माता लक्ष्मी की पूजा?
Diwali Puja 2026: कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मुख्य दिवाली मनाई जाती है। इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है। अमावस्या की रात चंद्रमा दिखाई नहीं देता और चारों ओर अंधेरा रहता है। ऐसे में घरों और मंदिरों में दीपक जलाने की परंपरा है।
धार्मिक मान्यता में दीपक को प्रकाश, ज्ञान और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। माता लक्ष्मी को धन, वैभव और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। मान्यता है कि दिवाली की रात घर की साफ-सफाई करके दीप जलाने और विधि-विधान से पूजा करने पर परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
धनतेरस पर नमक और अक्षत खरीदना क्यों माना जाता है शुभ?
धनतेरस पर सोना-चांदी और बर्तन खरीदने के साथ कुछ परिवारों में नमक और अक्षत यानी साबुत चावल खरीदने की भी परंपरा है। लोकमान्यता के अनुसार, इस दिन नया नमक घर लाने से बरकत बनी रहती है।
वहीं, अक्षत को पूर्णता, अन्न और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कुछ परिवार धनतेरस पर चावल खरीदकर माता लक्ष्मी को अर्पित करते हैं और पूजा के बाद इसे तिजोरी में रखते हैं। हालांकि, नमक और चावल खरीदने की ये परंपराएं क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। इन्हें सभी के लिए अनिवार्य धार्मिक नियम नहीं माना जाता।
धनतेरस से दिवाली तक तीनों पर्वों का क्या है संदेश?
धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दिवाली तीनों की अपनी अलग धार्मिक मान्यताएं हैं। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा करके अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है। छोटी दिवाली पर अभ्यंग स्नान और दीपदान की परंपरा है। इसके बाद अमावस्या की रात माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है।
इन त्योहारों का क्रम हिंदू पंचांग की तिथियों पर आधारित है। इनके साथ जुड़ी धार्मिक परंपराएं स्वास्थ्य, स्वच्छता, प्रकाश और सुख-समृद्धि का महत्व बताती हैं। यही वजह है कि धनतेरस से शुरू होकर दिवाली तक चलने वाले इन पर्वों को विशेष महत्व दिया जाता है।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और लोकपरंपराओं पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा-पद्धति और मान्यताओं में अंतर हो सकता है।



