
CG Smart Meter Project Delay Progress: छत्तीसगढ़ में बिजली व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए शुरू की गई स्मार्ट मीटरिंग योजना की प्रगति फिलहाल ठंडे बस्ते में नजर आ रही है। बिजली विभाग और ठेका कंपनियों के बीच समन्वय की कमी के कारण करोड़ों रुपये की यह महत्वाकांक्षी योजना अपनी तय समय-सीमा से पिछड़ रही है। हाल ही में जारी डेली प्रोग्रेस शीट ने विभाग के दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के कई हिस्सों में मीटर लगाने की रफ्तार इतनी धीमी है कि पूरे प्रोजेक्ट की सफलता पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं।
प्रदेश का औसत कार्य मात्र 59 प्रतिशत, कई क्षेत्रों में काम अधूरा
पूरे प्रदेश की बात करें तो उपभोक्ता मीटर लगाने का औसत कार्य केवल 59 प्रतिशत के आंकड़े तक ही पहुंच सका है। बिजली विभाग की डेली रिपोर्ट बताती है कि कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अब भी आधे से ज्यादा घरों में स्मार्ट मीटर नहीं लग पाए हैं। काम की यह धीमी गति न केवल शासन की योजना को प्रभावित कर रही है बल्कि विभाग की कार्यप्रणाली पर भी उंगलियां उठा रही है। अधिकारियों की ढीली मॉनिटरिंग और ठेका कंपनियों की सुस्ती इस पिछड़ेपन की मुख्य वजह मानी जा रही है।
अंबिकापुर और बिलासपुर रीजन में सबसे ज्यादा पिछड़ापन
स्मार्ट मीटर लगाने के मामले में आरके 1 क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अंबिकापुर और बिलासपुर रीजन की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। आंकड़ों के अनुसार अंबिकापुर रीजन में अब तक केवल 56 प्रतिशत मीटर ही लगाए जा सके हैं। वहीं बिलासपुर रीजन की हालत इससे भी खराब है जहां काम का आंकड़ा मात्र 46 प्रतिशत पर ही अटका हुआ है। इतने बड़े रीजन में काम की आधी प्रोग्रेस भी न हो पाना जमीनी स्तर पर बड़ी लापरवाही की ओर इशारा करता है।
रायपुर में 90 प्रतिशत काम पूरा पर दुर्ग अब भी पीछे
प्रोजेक्ट की प्रगति में क्षेत्रीय असमानता भी साफ नजर आ रही है। जहां रायपुर सिटी और रायपुर रूरल क्षेत्रों में काम तेजी से हुआ है और वहां 90 प्रतिशत से अधिक मीटरिंग पूरी हो चुकी है वहीं दुर्ग जैसे प्रमुख क्षेत्र में स्थिति संतोषजनक नहीं है। दुर्ग क्षेत्र में उपभोक्ता मीटरिंग का काम केवल 52 प्रतिशत पर सिमट कर रह गया है। रायपुर को छोड़कर अन्य जिलों की सुस्ती ने प्रोजेक्ट के कुल औसत को काफी नीचे गिरा दिया है जिससे विभाग की चिंता बढ़ गई है।
डीटी मीटरिंग में भी अपेक्षित लक्ष्य हासिल करना बाकी
उपभोक्ताओं के घरों के अलावा ट्रांसफॉर्मर यानी डीटी मीटरिंग का काम भी पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। पूरे प्रदेश में डीटी मीटरिंग का औसत कार्य लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंचा है। हालांकि यह आंकड़ा उपभोक्ता मीटरिंग से बेहतर है पर अब भी बड़ी संख्या में मीटर लगाए जाने शेष हैं। ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यदि इसी धीमी गति से कार्य जारी रहा तो भविष्य में बिजली बिलों के सटीक आकलन और तकनीकी सुधार में देरी होगी।
एजेंसियों की लापरवाही और तकनीकी खामियों से बढ़ी मुश्किलें
जमीनी स्तर पर काम सुस्त होने के पीछे कई बड़े कारण सामने आ रहे हैं। कई इलाकों से शिकायतें मिल रही हैं कि मीटर लगाने वाली एजेंसियों की टीमें तय समय पर मौके पर नहीं पहुंच रही हैं। इसके अलावा कई क्षेत्रों में तकनीकी खामियां और सर्वर से जुड़ी दिक्कतें भी काम की राह में रोड़ा बन रही हैं। उपभोक्ताओं को इस नई व्यवस्था के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी जा रही है जिससे कई जगहों पर लोग सर्वे और मीटर बदलने की प्रक्रिया का विरोध भी कर रहे हैं।
मॉनिटरिंग और समन्वय के अभाव में थमी योजना की चाल
बिजली विभाग के अधिकारियों और ठेका कंपनियों के बीच आपसी तालमेल की कमी ने इस योजना की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। काम की गुणवत्ता और गति को लेकर जो मॉनिटरिंग होनी चाहिए थी उसमें भारी चूक देखी जा रही है। बार-बार सर्वे होने और काम अधूरा छोड़ने से स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। यदि विभाग ने समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए और एजेंसियों पर लगाम नहीं कसी तो करोड़ों का यह निवेश बेकार साबित हो सकता है।



