Dhamtari Bhangarao VIDEO: धमतरी के जंगल में लगती है देवी-देवताओं की अनोखी अदालत, जहां कटघरे में खड़े होते हैं देवी-देवता, सजता है भंगाराव माई का दरबार, जानिए की अनोखी परंपरा

Dhamtari Bhangarao Mai Court: छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है जहां इंसानों की तरह देवी-देवताओं की पेशी होती है। नगरी-सिहावा क्षेत्र में स्थित कुर्सीघाट (बोराई) जंगल में हर साल भंगाराव माई की अदालत लगती है। इस दरबार में यदि किसी देवी-देवता से कोई चूक होती है, तो उनके प्रतीक को कटघरे में खड़ा किया जाता है। स्थानीय लोग इस परंपरा को वर्षों से पूरी आस्था के साथ निभाते आ रहे हैं।

भादो महीने में सजता है भंगाराव माई का दरबार

Chhattisgarh Unique Tradition: कुर्सीघाट-बोराई मार्ग पर घने जंगलों के बीच हर साल भादो महीने की शुरुआत में यह जात्रा आयोजित की जाती है। इस दौरान आसपास के कई ग्रामीण इलाकों से देवी-देवताओं के प्रतीक चिह्न लाए जाते हैं। मान्यता है कि भंगाराव माई की अनुमति के बिना क्षेत्र में कोई भी देव कार्य संपन्न नहीं हो सकता। यही कारण है कि इस आयोजन का धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्व है।

तीन राज्यों से जुड़ती है आस्था की डोर

Sihawa Bhangarao Mai: इस अनोखी देव-अदालत में केवल धमतरी ही नहीं, बल्कि बस्तर और पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी देवी-देवताओं के प्रतीक पहुंचते हैं। यदि किसी गांव में फसल खराब होती है, बीमारी फैलती है या कोई विपदा आती है, तो संबंधित गांव के देव-प्रतीक के खिलाफ भंगाराव माई के सामने शिकायत दर्ज कराई जाती है। इसके बाद परंपरा के अनुसार मामले की सुनवाई की जाती है।

देखें वीडियो-

सुनवाई के बाद तय होती है प्रतीकात्मक सजा

Dhamtari News Update: दरबार के दौरान सिरहा और पुजारी के माध्यम से सुनवाई की प्रक्रिया पूरी होती है। यदि शिकायत सही पाई जाती है, तो दोषी माने गए देवी-देवता के प्रतीक को सजा दी जाती है। इस प्रक्रिया में प्रतीकात्मक रूप से उन्हें हिरासत में रखने या सीमा से बाहर करने जैसी परंपराएं शामिल हैं। सजा पूरी होने के बाद ही उन्हें पुनः सम्मानित स्थान दिया जाता है।

श्रद्धालुओं और आदिवासियों का उमड़ता है सैलाब

Darbar of Bhangarao Mai: इस वार्षिक आयोजन को देखने और हिस्सा लेने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय आदिवासी समुदाय के लिए यह आयोजन केवल एक धार्मिक पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और परंपरा का अहम हिस्सा है। जंगल के बीच लगने वाला यह मेला क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने में मदद करता है।

प्रशासन भी सहयोग के लिए रहता है तत्पर

सदियों पुरानी इस सांस्कृतिक परंपरा को लेकर धमतरी के कलेक्टर अबिनाश मिश्रा ने जानकारी दी कि यह आयोजन छत्तीसगढ़ और ओडिशा की साझा विरासत का प्रतीक है। इतने बड़े पैमाने पर होने वाले धार्मिक मेले को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से आयोजित करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर सभी आवश्यक तैयारियां और सहयोग प्रदान किया जाता है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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