
खाड़ी देशों में जारी युद्ध और अंतरराष्ट्रीय तनाव का सीधा असर अब भारतीय रसोई पर दिखने लगा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव की वजह से खाद्य तेलों की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। थोक बाजारों में तेल के प्रति टिन (13 से 15 किलो) के दाम में 140 रुपये से लेकर 300 रुपये तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। केवल तेल ही नहीं, बल्कि पेट्रोलियम उत्पादों से जुड़ी अन्य वस्तुएं जैसे प्लास्टिक बोतलें और डिस्पोजल सामग्री के दाम भी बढ़ गए हैं। महंगाई की इस दोहरी मार ने आम आदमी के मासिक बजट को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है।
रसोई में लगी ‘आग’: तेल के डिब्बे पर 300 रुपये तक बढ़े दाम
गोलबाजार के थोक व्यापारियों के अनुसार, पिछले महज एक सप्ताह के भीतर खाद्य तेल की कीमतों ने आसमान छू लिया है। पाम ऑयल, सोयाबीन और सूरजमुखी के तेल की कीमतों में प्रति टिन भारी बढ़ोतरी हुई है। खुदरा बाजार में भी तेल की बोतलें महंगी बिक रही हैं। व्यापारियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय हलचल की वजह से थोक भाव में अचानक तेजी आई है, जिससे आने वाले दिनों में आम उपभोक्ताओं की जेब और ढीली होना तय है।
सप्लाई चेन पर संकट: युद्ध की वजह से क्यों बढ़ रही हैं कीमतें?
खाद्य तेल की कीमतों में इस उछाल की सबसे बड़ी वजह भारत की विदेशों पर निर्भरता है। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आयात करता है। वर्तमान युद्ध की स्थिति के कारण समुद्री रास्तों में खतरा बढ़ गया है, जिससे माल ढुलाई (फ्रेट) का खर्च काफी महंगा हो गया है। इसके अलावा, कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में तेजी आने से ट्रांसपोर्टेशन और पैकेजिंग लागत में भी इजाफा हुआ है, जिसका अंतिम बोझ ग्राहकों पर पड़ रहा है।
प्लास्टिक और डिस्पोजल भी महंगे: प्रति बंडल 10 रुपये तक की तेजी
तेल के साथ-साथ प्लास्टिक से बनी वस्तुओं के दाम भी बढ़ गए हैं। बाजार में डिस्पोजल सामग्री के दाम प्रति बंडल 5 से 10 रुपये तक बढ़ चुके हैं। जो डिस्पोजल बंडल पहले 15 रुपये में आसानी से मिल जाता था, अब उसकी कीमत 20 रुपये से पार हो गई है। चूंकि प्लास्टिक और डिस्पोजल पेट्रोलियम उत्पादों से तैयार होते हैं, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली किसी भी हलचल का इन पर सीधा असर पड़ता है। साथ ही, प्लास्टिक ग्रेन्यूल के आयात में कमी और बढ़ती मांग ने भी रेट बढ़ा दिए हैं।
लॉकडाउन की अफवाहों से बढ़ा डर: बाजार में हो रही है ‘पैनिक बाइंग’
महंगाई के बीच बाजार में लॉकडाउन लगने की अफवाहें भी तेजी से फैल रही हैं। इन चर्चाओं के चलते लोग डरे हुए हैं और जरूरत से ज्यादा सामान खरीदकर स्टॉक करने में जुट गए हैं। गोलबाजार और शहर की चाय दुकानों पर लोग भविष्य की अनिश्चितता को लेकर चर्चा करते देखे जा सकते हैं। इस ‘पैनिक बाइंग’ की वजह से बाजार में सामान की कृत्रिम कमी पैदा हो रही है, जिससे कीमतों को और हवा मिल रही है। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे ऐसी किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें।
आयात पर निर्भरता: क्यों बेबस है भारतीय बाजार?
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत में खाद्य तेल की खपत बहुत ज्यादा है, लेकिन घरेलू उत्पादन उस तुलना में काफी कम है। हालांकि देश में मूंगफली, सरसों और सोयाबीन की खेती बड़े पैमाने पर होती है, फिर भी कुल मांग को पूरा करने के लिए हमें विदेशों से पाम ऑयल और सनफ्लावर ऑयल मंगाना पड़ता है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार या भू-राजनीतिक स्थितियों में कोई बदलाव होता है, तो भारतीय रसोई का बजट तुरंत प्रभावित हो जाता है। उत्पादन और खपत के बीच का यह बड़ा अंतर ही कीमतों में अस्थिरता का मुख्य कारण है।
जमाखोरी पर नजर: प्रशासन की तैयारी और व्यापारियों की दलील
कीमतों में अचानक आई तेजी को देखते हुए प्रशासन अब स्टॉक की निगरानी करने की तैयारी में है। आरोप लग रहे हैं कि कुछ व्यापारी मुनाफाखोरी के चक्कर में स्टॉक दबाकर बैठे हैं, जिससे बाजार में कृत्रिम तेजी बनी हुई है। व्यापारियों का तर्क है कि ऊपर से ही माल महंगा मिल रहा है और स्टॉक सीमित होने की वजह से उन्हें ऊंचे दामों पर बिक्री करनी पड़ रही है। फिलहाल बाजार की स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय हालात सामान्य नहीं होते, तब तक कीमतों में बड़ी राहत की उम्मीद कम है।



