छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण कानून पर ‘सुप्रीम’ अड़चन: बजट सत्र में विधेयक पेश करने पर संशय, जानें क्या हैं नए कड़े प्रावधान

कानूनी पेच में फंसा नया मसौदा : छत्तीसगढ़ सरकार राज्य में धर्मांतरण के खिलाफ एक बेहद सख्त कानून लाने की तैयारी में है, लेकिन फिलहाल यह मामला कानूनी उलझनों में फंसता दिख रहा है। सरकार ने शीतकालीन सत्र में ही इस संशोधन विधेयक को लाने की घोषणा की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में देश के विभिन्न राज्यों के मतांतरण विरोधी कानूनों की वैधता को चुनौती दी गई है। अदालत ने छत्तीसगढ़ समेत 10 राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इसी वजह से सरकार अब फूंक-फूंक कर कदम रख रही है ताकि नया कानून कोर्ट में टिक सके।

बजट सत्र को लेकर बना हुआ है असमंजस

छत्तीसगढ़ विधानसभा का बजट सत्र 23 फरवरी से शुरू होने वाला है, लेकिन सरकार अभी भी इस ऊहापोह में है कि विधेयक पेश किया जाए या नहीं। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा की अध्यक्षता में गठित कैबिनेट सब-कमेटी इस मसौदे पर लगातार मंथन कर रही है। समिति का मुख्य जोर इस बात पर है कि कानून को इतना प्रभावी और संवैधानिक रूप से मजबूत बनाया जाए कि उसे भविष्य में अदालत में चुनौती न दी जा सके। हालांकि, सदन में इसे पेश करने की कोई निश्चित तारीख अभी तय नहीं हुई है।

बस्तर और सरगुजा में बढ़ा विवाद

पिछले दो सालों में छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण से जुड़ी 100 से ज्यादा शिकायतें आधिकारिक तौर पर दर्ज की गई हैं। सबसे ज्यादा विवाद आदिवासी बहुल इलाकों जैसे बस्तर और सरगुजा में देखने को मिल रहे हैं। हिंदू संगठनों का आरोप है कि मिशनरी संस्थाएं आर्थिक प्रलोभन और दबाव के जरिए ग्रामीणों का धर्म परिवर्तन करा रही हैं। इसी दबाव और सामाजिक तनाव को देखते हुए सरकार एक ऐसा कानून चाहती है जो इन गतिविधियों पर पूरी तरह से लगाम लगा सके।

रिटायर्ड अधिकारी की गिरफ्तारी से मचा बवाल

प्रदेश में हाल ही में धर्मांतरण को लेकर कई बड़ी घटनाएं हुई हैं। 29 जनवरी 2026 को सरगुजा पुलिस ने एक रिटायर्ड डिप्टी कलेक्टर ओमेगा टोप्पो को उनके घर पर प्रार्थना सभा के जरिए मतांतरण कराने के आरोप में गिरफ्तार किया था। इसके अलावा राजनांदगांव और कांकेर में भी प्रार्थना सभाओं को लेकर ग्रामीणों और हिंदू संगठनों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया। इन घटनाओं ने शासन पर जल्द से जल्द कड़ा कानून लागू करने का दबाव बढ़ा दिया है।

60 दिन पहले देनी होगी सूचना

नए कानून के प्रस्तावित मसौदे में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान सूचना देने का है। अब धर्म परिवर्तन करने से कम से कम दो महीने पहले जिला प्रशासन को एक फॉर्म भरकर जानकारी देनी होगी। इसके बाद पुलिस और प्रशासन इस बात की जांच करेंगे कि व्यक्ति अपनी मर्जी से धर्म बदल रहा है या उस पर कोई दबाव है। यदि बिना सूचना दिए धर्म परिवर्तन किया गया, तो उसे कानूनन अमान्य माना जाएगा और संबंधित पक्षों पर कार्रवाई होगी।

आरक्षण और सरकारी लाभ पर गिरेगी गाज

नए कानून में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लोगों के लिए कड़े नियम बनाए जा रहे हैं। प्रावधान के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति धर्मांतरण करता है, तो उसे मिलने वाले आरक्षण के लाभ और अन्य सरकारी सुविधाओं से हाथ धोना पड़ सकता है। सरकार का मानना है कि इससे प्रलोभन के जरिए होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगेगी। साथ ही, परिजनों को यह अधिकार दिया गया है कि वे किसी भी संदिग्ध धर्मांतरण के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा सकें।

सामूहिक धर्मांतरण पर 10 साल की जेल

सजा के प्रावधानों को भी पहले से काफी सख्त किया गया है। महिलाओं, नाबालिगों या आदिवासियों का अवैध धर्मांतरण कराने पर दोषियों को 2 से 10 साल तक की जेल और 25 हजार रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। वहीं, सामूहिक रूप से धर्म परिवर्तन कराने के मामले में 3 से 10 साल की कैद और 50 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा कोर्ट पीड़ित को 5 लाख रुपये तक का मुआवजा दिलाने का आदेश भी दे सकता है।

साबित करने की जिम्मेदारी धर्म बदलने वाले पर

इस कानून की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें ‘बर्डन ऑफ प्रूफ’ यानी साबित करने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति या संस्था पर होगी जो धर्म परिवर्तन करा रही है। उन्हें अदालत में यह सिद्ध करना होगा कि यह धर्मांतरण किसी लालच, धोखाधड़ी या दबाव में नहीं किया गया है। यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो धर्मांतरण को अवैध घोषित कर दिया जाएगा। इससे जांच एजेंसियों को दोषियों पर शिकंजा कसने में आसानी होगी।

चंगाई सभाओं पर प्रशासन की पैनी नजर

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में होने वाली ‘चंगाई सभाओं’ को लेकर संघ और अन्य संगठन लंबे समय से चिंता जताते रहे हैं। जशपुर, रायगढ़ और नारायणपुर जैसे क्षेत्रों में यह मुद्दा अब गुटीय संघर्ष का रूप ले चुका है। कई गांवों ने तो प्रस्ताव पारित कर बाहरी पादरियों के प्रवेश पर ही पाबंदी लगा दी है। सरकार का तर्क है कि ऐसे आयोजनों की आड़ में चल रहे खेल को रोकने के लिए एक विशेष राज्य स्तरीय कानून की तत्काल आवश्यकता है।

सरकार का अगला कदम क्या होगा?

फिलहाल कैबिनेट सब-कमेटी सुप्रीम कोर्ट के कानूनी पेंच को सुलझाने में जुटी है। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल का कहना है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और हर किसी को अपने धर्म के प्रचार का अधिकार है, लेकिन जबरन मतांतरण पूरी तरह गलत है। सरकार अन्य राज्यों के कानूनों का अध्ययन कर एक ऐसा ‘फूलप्रूफ’ मसौदा तैयार कर रही है जो विधानसभा से पारित होने के बाद कानूनी चुनौतियों का मजबूती से सामना कर सके।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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