
Naxalite Ramli Podiyam: बस्तर के नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ इलाके से एक ऐसी दास्तां सामने आई है जिसे सुनकर हर कोई दंग है। यह कहानी मुठभेड़ के बाद होने वाली पहचान प्रक्रिया और जमीनी हकीकत पर भी बड़े सवाल खड़े करती है। जिस बेटी को मां-बाप ने मृत मानकर अपने हाथों से मिट्टी दी थी और जिसका अंतिम संस्कार तक कर दिया गया था, वह करीब दो साल बाद अचानक जिंदा घर लौट आई। रमली पोड़ियाम नाम की इस युवती को देखकर न केवल उसका परिवार बल्कि पूरा गांव सन्न रह गया।
कांकेर मुठभेड़ और पहचान की वो बड़ी चूक
पूरा मामला 16 अप्रैल 2024 को कांकेर जिले में हुई एक बड़ी मुठभेड़ से जुड़ा है। उस समय पुलिस ने 29 माओवादियों को मार गिराने का दावा किया था। मुठभेड़ के पांच दिन बाद जब शवों की शिनाख्त शुरू हुई, तो रेकावाया गांव के एक परिवार ने एक महिला नक्सली के शव को अपनी बेटी रमली पोड़ियाम समझ लिया। दरअसल, गोली लगने के कारण शव का चेहरा बुरी तरह बिगड़ चुका था और शारीरिक बनावट रमली से मिलती-जुलती थी। इसी भ्रम में परिजनों ने शव लिया और गांव ले जाकर उसका अंतिम संस्कार कर दिया।

सहेली की मौत और नाम की समानता ने बढ़ाया भ्रम
जांच में यह बात सामने आई है कि यह भ्रम आखिर हुआ कैसे। रमली ने साल 2023 में नक्सल संगठन जॉइन किया था, जहां उसका नाम ‘जैनी’ रखा गया था। संयोग से उसी मुठभेड़ में कलपा गांव की एक अन्य महिला माओवादी भी मारी गई थी, जिसका नाम भी ‘जैनी’ ही था। साथ ही रमली की करीबी सहेली सुनीला मड़काम की लाश भी उसी दिन मिली थी। इन कड़ियों के मिलने से परिवार को पूरा यकीन हो गया कि उनकी बेटी अब इस दुनिया में नहीं रही। जो शव रमली के घर वालों को सौंपा गया, वह दरअसल कलपा वाली ‘जैनी’ का था।
जब घर के दरवाजे पर खड़ी दिखी ‘मृत’ बेटी
साल 2024 के आखिरी महीनों में जब रमली अचानक अपने घर पहुंची, तो वहां कोहराम मच गया। उसकी मां हिड़मे और भाई दशमो पोड़ियाम को अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था। भाई दशमो ने बताया कि उन्होंने जिसे अपनी बहन समझकर दफनाया था, वह कोई और थी। रमली का वापस आना उनके लिए किसी पुनर्जन्म से कम नहीं था। घर वालों ने खुशी और भावुकता के बीच रमली को दोबारा कभी जंगल न लौटने की कसम खिलाई और उसे घर पर ही रोक लिया।
बंदूक छोड़ थामी विकास की राह, पुलिस के सामने सरेंडर
परिजनों की समझाइश और हिंसा के रास्ते से तंग आकर रमली ने समाज की मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। उसने 31 मार्च 2026 को दंतेवाड़ा पुलिस के पास जाकर आत्मसमर्पण कर दिया। वर्तमान में वह पुलिस लाइन में रहकर नई जिंदगी की शुरुआत के लिए प्रशिक्षण ले रही है। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि उसका समर्पण औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है और उसे सरकार की पुनर्वास नीति के तहत मिलने वाली प्रोत्साहन राशि भी जल्द ही प्रदान की जाएगी।
शवों की शिनाख्त प्रणाली पर खड़े हुए गंभीर सवाल
यह अनोखी घटना बस्तर के संघर्षरत इलाकों की एक कड़वी सच्चाई को भी बयां करती है। मुठभेड़ के बाद बिगड़े हुए शवों की पहचान केवल हुलिए के आधार पर करना कितना जोखिम भरा हो सकता है, यह मामला इसका बड़ा सबूत है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में डीएनए टेस्ट या वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल अनिवार्य होना चाहिए। आज भी बस्तर के कई परिवार ऐसे हैं जो अपनों के लापता होने या गलत पहचान की वजह से मानसिक और सामाजिक संघर्ष झेल रहे हैं।



