
इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक रमजान के पाक महीने के खत्म होते ही शव्वाल की पहली तारीख को ईद-उल-फितर का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भाईचारे, प्रेम और परोपकार का प्रतीक है। अरबी भाषा में ‘ईद’ का अर्थ उत्सव और ‘फितर’ का अर्थ उपवास खोलना होता है। साल 2026 में भी चांद के दीदार के साथ ही इस मुबारक दिन की शुरुआत हो रही है। भारत समेत पूरी दुनिया में मुस्लिम समुदाय के लोग इस दिन खुदा का शुक्र अदा करते हैं और एक-दूसरे के गले मिलकर खुशियां बांटते हैं।
ईद मनाने की खास परंपराएं: सुन्नत के मुताबिक ऐसे शुरू होता है दिन
ईद के दिन सुबह की शुरुआत इबादत और स्वच्छता के साथ होती है। इस्लाम के पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब की बताई गई परंपराओं यानी ‘सुन्नत’ का पालन करना इस दिन बेहद अहम माना जाता है। मुस्लिम समाज के लोग सुबह जल्दी उठकर खुदा की इबादत की तैयारी करते हैं। इस दिन की मुख्य रस्में निम्नलिखित हैं:
- पवित्र स्नान और स्वच्छता: सुबह जल्दी उठकर नहाना और खुद को साफ-सुथरा करना।
- नए परिधान और इत्र: सामर्थ्य के अनुसार नए या सबसे साफ कपड़े पहनना और खुशबू (इत्र) लगाना।
- तकबीर का पाठ: ईदगाह या मस्जिद जाते समय रास्ते में धीमी आवाज में अल्लाह की बड़ाई के शब्द (तकबीर) पढ़ना।
- रास्ता बदलना: नमाज के लिए जिस रास्ते से जाएं, वापसी में दूसरे रास्ते का चुनाव करना ताकि ज्यादा लोगों से मुलाकात हो सके।
जकात-उल-फितर का महत्व: गरीबों की खुशी का खास ध्यान
ईद की खुशियां तब तक अधूरी मानी जाती हैं जब तक समाज के पिछड़े और जरूरतमंद तबके को इसमें शामिल न किया जाए। इसी उद्देश्य के लिए ‘जकात-उल-फितर’ या ‘फितरा’ का नियम बनाया गया है। यह एक अनिवार्य दान है जो हर सक्षम मुसलमान को ईद की नमाज से पहले देना होता है। इसके पीछे का फलसफा यह है कि कोई भी गरीब व्यक्ति ईद के दिन भूखा न रहे और वह भी नए कपड़े पहनकर त्योहार मना सके।
फितरा देने के जरूरी नियम: कब और किसे दिया जाता है यह दान
जकात-उल-फितर देने का एक निश्चित समय और तरीका होता है। धार्मिक जानकारों के मुताबिक इसे ईद की नमाज के लिए घर से निकलने से पहले अदा कर देना चाहिए। फितरे से जुड़ी कुछ मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:
- अनिवार्यता: यह दान घर के हर सदस्य (बच्चे और बड़े) की ओर से दिया जाता है।
- दान की मात्रा: आमतौर पर प्रति व्यक्ति पौने दो किलो अनाज (जैसे गेहूं या जौ) या उसकी बाजार कीमत के बराबर नकद राशि दी जाती है।
- सही पात्र: यह राशि सीधे तौर पर उन गरीबों, यतीमों या बेवाओं को दी जाती है जिनके पास ईद मनाने के साधन नहीं हैं।
- जरिया: लोग इसे स्वयं जाकर दे सकते हैं या मस्जिद और विश्वसनीय संस्थाओं के माध्यम से भी पहुंचा सकते हैं।
ईद की मुबारकबाद और ईदी: अपनों के बीच बंटता है प्यार
नमाज के बाद लोग एक-दूसरे से गले मिलते हैं और ‘ईद मुबारक’ कहकर दुआएं देते हैं। घरों में मीठी सेवइयां और तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। इस दिन का सबसे बड़ा आकर्षण बच्चों के लिए ‘ईदी’ होती है। परिवार के बुजुर्ग बच्चों को उपहार या नकद पैसे देते हैं, जिसे ईदी कहा जाता है। इससे बच्चों में त्योहार के प्रति उत्साह और बड़ों के प्रति सम्मान बढ़ता है।
सामाजिक समरसता का संदेश: हर भेदभाव को मिटा देता है यह पर्व
ईद केवल एक मजहबी त्योहार नहीं है बल्कि यह सामाजिक एकता का भी संदेश देता है। ईदगाह की सफों (कतारों) में अमीर और गरीब एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं। यह दृश्य बताता है कि खुदा की नजर में सब बराबर हैं। लोग अपने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को माफ करते हैं और नई शुरुआत करते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में ईद का त्योहार गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करता है जहां हर धर्म के लोग मिलकर खुशियां मनाते हैं।
चांद के हिसाब से बदलती तारीखें: हिजरी कैलेंडर का विज्ञान
कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि ईद हर साल अलग-अलग तारीखों पर क्यों आती है। दरअसल, इस्लामी कैलेंडर ‘हिजरी’ पूरी तरह से चंद्रमा की गति पर आधारित होता है। चंद्रमा का साल सौर वर्ष (365 दिन) के मुकाबले करीब 11 दिन छोटा होता है। यही कारण है कि हर साल रमजान और ईद की तारीखें अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से पीछे खिसकती रहती हैं। साल 2026 में भी पूरी दुनिया की नजरें आसमान पर टिकी हैं ताकि शव्वाल के चांद के दीदार के साथ ही ईद का जश्न शुरू हो सके।
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