
मिडिल ईस्ट में सुलग रही युद्ध की चिंगारी अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झुलसाने के लिए तैयार है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने आगाह किया है कि इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव वैश्विक बाजार में भयंकर महंगाई और सुस्त रफ्तार लेकर आएगा। छत्तीसगढ़ सहित देशभर के बाजारों में इस अनिश्चितता का असर अभी से दिखने लगा है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट उन विकासशील देशों के लिए सबसे ज्यादा घातक साबित होगा जो अभी-अभी पुरानी मंदी के दौर से उबरने की कोशिश कर रहे थे।
ऊर्जा संकट की आहट: होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ तो रुक जाएगी तेल की रफ्तार
दुनिया की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है। वैश्विक स्तर पर होने वाली तेल की कुल सप्लाई का करीब 30 प्रतिशत और एलएनजी (LNG) का 20 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से निकलता है। जंग के कारण अगर यह मार्ग प्रभावित होता है, तो एशिया और यूरोप के देशों में ईंधन की भारी किल्लत हो सकती है। भारत जैसे देश जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं, वहां पेट्रोल, डीजल और बिजली बनाना काफी महंगा हो जाएगा।
थाली पर महंगाई की मार: खाद और अनाज के दाम छू सकते हैं आसमान
इस युद्ध का असर केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा असर आपकी रसोई पर भी पड़ेगा। IMF के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से उर्वरक (Fertilizer) की कीमतें बढ़ सकती हैं। खेती के लिए जरूरी खाद और इनपुट्स महंगे होने से गेहूं, दाल और सब्जियों के उत्पादन की लागत बढ़ जाएगी। गरीब और मध्यम वर्गीय देशों में खाद्य सुरक्षा का संकट खड़ा हो सकता है, जिससे आम आदमी की थाली से दाल और जरूरी अनाज महंगे हो जाएंगे।
तकनीक और स्वास्थ्य पर संकट: हीलियम की कमी से रुकेंगे कार और मोबाइल के पहिए
खाड़ी देश दुनिया में हीलियम गैस की सप्लाई का एक प्रमुख केंद्र हैं। हीलियम का इस्तेमाल मोबाइल-लैपटॉप के सेमीकंडक्टर चिप्स बनाने और अस्पतालों की एमआरआई (MRI) जैसी मेडिकल मशीनों में किया जाता है। सप्लाई चेन में बाधा आने से इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, कार और स्वास्थ्य उपकरण महंगे हो सकते हैं। जहाजों के रास्ते बदलने और समुद्री बीमा (Insurance) की दरें बढ़ने से हर सामान की डिलीवरी में देरी हो रही है, जिससे ट्रांसपोर्टेशन का खर्च भी बढ़ गया है।
रुपया और शेयर बाजार: निवेशकों में डर का माहौल, कमजोर होगी भारतीय करेंसी
वैश्विक तनाव के चलते शेयर बाजारों में अभी से गिरावट का दौर शुरू हो गया है। निवेशक अपना पैसा सुरक्षित जगहों पर लगा रहे हैं, जिससे वित्तीय परिस्थितियां सख्त हो गई हैं। जानकारों का कहना है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया और भी कमजोर हो सकता है। रुपए की गिरती कीमत का मतलब है कि विदेशों से आने वाली हर मशीनरी और कच्चा माल भारत के लिए महंगा हो जाएगा, जिसका सीधा असर देश की जीडीपी ग्रोथ पर पड़ेगा।
आम आदमी की जेब पर बोझ: ₹5-10 की बढ़त भी बिगाड़ देगी घर का बजट
इस वैश्विक उथल-पुथल का सबसे बड़ा शिकार आम आदमी और गरीब तबका बनेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में मामूली ₹5-10 की बढ़ोतरी भी माल ढुलाई (Transportation) को काफी महंगा कर देगी। जब ट्रकों का किराया बढ़ता है, तो इसका असर राशन से लेकर कपड़ों और दवाओं तक हर छोटी-बड़ी चीज पर पड़ता है। मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए अपना मासिक बजट संभालना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा, क्योंकि महंगाई का यह चक्र पूरी अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में ले लेगा।
आगे क्या होगा: कूटनीतिक समाधान ही एकमात्र रास्ता
IMF और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं का मानना है कि अगर इस तनाव को बातचीत के जरिए तुरंत नहीं सुलझाया गया, तो दुनिया एक और बड़ी आर्थिक मंदी की तरफ बढ़ सकती है। फिलहाल सभी देशों की नजरें कच्चे तेल के उत्पादन और समुद्री रास्तों की सुरक्षा पर टिकी हैं। भारत सरकार भी रणनीतिक भंडार और वैकल्पिक व्यापारिक रास्तों पर विचार कर रही है ताकि घरेलू बाजार को इस झटके से बचाया जा सके। आने वाले कुछ हफ्ते वैश्विक बाजार की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।
Also Read: इस देश में फिर लौटा लॉकडाउन! तेल-गैस की भारी किल्लत, सरकार ने बनाया ये ‘खतरनाक’ प्लान



