
Tribal Protest ST Reservation Religious Conversion: धर्मांतरण कर चुके लोगों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची से बाहर करने की मांग अब देश के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। इसी सिलसिले में देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में देश भर के आदिवासी समाजों का एक विशाल महासमागम आयोजित किया गया है। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के मौके पर जनजाति सुरक्षा मंच के नेतृत्व में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के कोने-कोने से लाखों आदिवासियों के जुटने का दावा किया गया है। यह बड़ा आयोजन महज एक सांस्कृतिक मिलाप नहीं है बल्कि जनजातीय पहचान, आरक्षण के अधिकारों और डीलिस्टिंग बिल को लेकर केंद्र सरकार को एक कड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश है।
क्या है डीलिस्टिंग की मूल मांग, क्यों उठ रही है आरक्षण से बाहर करने की आवाज
जनजातीय संगठनों का तर्क है कि जो आदिवासी अपनी मूल संस्कृति, पारंपरिक रीति-रिवाजों, देवी-देवताओं और रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था को छोड़कर दूसरा धर्म अपना चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति की सूची से तत्काल बाहर किया जाना चाहिए। समाज के प्रमुख नेताओं का कहना है कि भारतीय संविधान में आदिवासियों को मिलने वाला आरक्षण और विशेष संरक्षण उनकी विशिष्ट जीवनशैली और प्राचीन संस्कृति को बचाए रखने के लिए दिया गया था। संगठनों का आरोप है कि धर्म बदलने के बाद भी एसटी वर्ग के तमाम फायदों को स्थायी रूप से लेना उन मूल आदिवासियों के साथ अन्याय है जो आज भी अपनी परंपराओं को सहेजकर तंगहाली में जी रहे हैं।
देश के कई राज्यों से दिल्ली पहुंचे लाखों लोग, पारंपरिक वेशभूषा में दिखे आदिवासी
इस महाधिवेशन में अपनी आवाज बुलंद करने के लिए गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्यों से भारी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग दिल्ली पहुंचे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से पारंपरिक पोशाक पहने और अपने स्थानीय वाद्ययंत्रों को बजाते हुए युवाओं और बुजुर्गों की टोलियां दिल्ली के लिए रवाना हुई थीं। कार्यक्रम के आयोजकों का कहना है कि यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में अपनी सांस्कृतिक अस्मिता और मूल हकों की लड़ाई के लिए आदिवासियों का अब तक का सबसे बड़ा और शांतिपूर्ण शक्ति प्रदर्शन है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय समेत कई दिग्गज नेता पहुंचे दिल्ली, मिशनरियों पर साधा निशाना
इस बड़े आंदोलन में छत्तीसगढ़ की भी बड़ी राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सहित राज्य के कई कद्दावर आदिवासी नेता इस समागम का हिस्सा बनने दिल्ली पहुंचे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार के कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम ने इस मुद्दे पर बात करते हुए कहा कि पिछले लंबे समय से आदिवासी समाज की मूल आस्था और संस्कृति पर योजनाबद्ध तरीके से प्रहार किया गया है। उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पहले के शासनकाल में मिशनरी संस्थाओं को अप्रत्यक्ष संरक्षण मिला, जिसकी वजह से छत्तीसगढ़ के वनांचल इलाकों में बड़े पैमाने पर भोले-भले आदिवासियों का मत परिवर्तन कराया गया।
रामविचार नेताम बोले- समाज की सरलता और गरीबी का उठाया गया फायदा, अब खींचनी होगी लक्ष्मण रेखा
कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम ने आगे कहा कि आदिवासी समाज की आर्थिक कमजोरी, अज्ञानता और सीधेपन का अनुचित लाभ उठाकर लोगों को उनकी जड़ों और पूर्वजों की मान्यताओं से दूर कर दिया गया। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि अब वह समय आ चुका है जब समाज और कानून के भीतर एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींची जानी चाहिए। जो लोग अपनी मूल जनजातीय पहचान और पूजा पद्धति को पूरी तरह त्याग चुके हैं, उन्हें दोबारा अनुसूचित जनजाति के कोटे से मिलने वाले आरक्षण और अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने का कोई नैतिक और कानूनी अधिकार नहीं होना चाहिए।
वैचारिक और राजनीतिक हलकों में बहस तेज, सांस्कृतिक अस्मिता बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा
डीलिस्टिंग की इस देशव्यापी मांग ने देश के बुद्धिजीवियों, विधि विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस आंदोलन के समर्थक जहां इसे आदिवासी अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक रक्षा मान रहे हैं, वहीं इसके विरोधी इसे नागरिकों की व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ बता रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि यदि समय रहते डीलिस्टिंग बिल को कानूनी रूप नहीं दिया गया, तो आने वाले कुछ दशकों में देश का मूल आदिवासी समाज अपनी वास्तविक पहचान और ऐतिहासिक वजूद को पूरी तरह खो देगा।
छत्तीसगढ़ की राजनीति पर भी पड़ेगा इसका सीधा असर, लुंड्रा विधायक प्रबोध मिंज का उदाहरण आया सामने
अगर केंद्र सरकार संसद में डीलिस्टिंग बिल लेकर आती है और यह कानून बन जाता है, तो छत्तीसगढ़ की स्थानीय राजनीति में इसके गहरे प्रभाव देखने को मिलेंगे। बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लुंड्रा सीट से प्रबोध मिंज को अपना उम्मीदवार बनाया था। टिकट वितरण के समय भाजपा के ही एक धड़े ने प्रबोध मिंज का यह कहकर विरोध किया था कि वे ईसाई धर्म अपना चुके हैं, इसलिए उन्हें एसटी आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ाया जाना चाहिए। हालांकि, पार्टी ने स्थानीय समीकरणों के चलते उन्हें टिकट दिया और वे चुनाव जीत गए। जानकारों का मानना है कि डीलिस्टिंग कानून लागू होने पर ऐसे कई चेहरों का राजनीतिक भविष्य संकट में पड़ सकता है।



