बस्तर में ‘विदेशी सोने’ की एंट्री? पूर्व विधायक मनीष कुंजाम का दावा- विदेशों से जुड़ा हो सकता है नक्सलियों का नेटवर्क

नक्सली डंप से बरामद सोने को लेकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में नया उबाल आ गया है। पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने इस मामले में एक बेहद चौंकाने वाला बयान दिया है। उन्होंने दावा किया है कि नक्सलियों तक विदेशों से सोने की सप्लाई हो रही है और इसके तार स्विट्जरलैंड जैसे देशों से जुड़े हो सकते हैं। कुंजाम ने इसे सीधे तौर पर देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला बताया है। उनके इस बयान के बाद अब बस्तर में सक्रिय नक्सली संगठनों की फंडिंग और उनके अंतरराष्ट्रीय संपर्कों को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर बड़ा खतरा: विदेशी फंडिंग और सोने के कनेक्शन की जांच की मांग

मनीष कुंजाम का कहना है कि नक्सलियों के पास से बड़ी मात्रा में सोने का मिलना कोई सामान्य घटना नहीं है। उन्होंने आशंका जताई कि विदेशी ताकतों के जरिए नक्सलियों को आर्थिक मजबूती दी जा रही है। कुंजाम ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की है कि इस पूरे नेटवर्क की गहराई से पड़ताल की जाए। अगर नक्सलियों के पास विदेशी सोना पहुंच रहा है, तो यह स्पष्ट करता है कि उनके इरादे और संपर्क कितने ऊंचे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर किन रास्तों से यह सोना बस्तर के जंगलों तक पहुंच रहा है।

बस्तर में फंडिंग का खेल: कहां से आ रहा है नक्सली गतिविधियों के लिए पैसा?

पूर्व विधायक ने बस्तर में सक्रिय संगठनों की आर्थिक कुंडली खंगालने पर जोर दिया है। उनका मानना है कि बाहरी सहायता के बिना इतनी बड़ी नक्सली गतिविधियों को लंबे समय तक चलाना संभव नहीं है। कुंजाम ने कहा कि केवल हथियारों की तस्करी ही नहीं, बल्कि अब कीमती धातुओं के जरिए भी फंडिंग का खेल चल रहा है। उन्होंने अंदेशा जताया कि यदि समय रहते इन स्रोतों को बंद नहीं किया गया, तो नक्सलवाद को जड़ से मिटाना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।


आत्मसमर्पित नक्सलियों पर सवाल: जल, जंगल और जमीन की लड़ाई से क्यों मोड़ा मुंह?

मनीष कुंजाम ने उन नक्सलियों पर भी निशाना साधा है जिन्होंने हाल के दिनों में सरेंडर किया है। उनका कहना है कि आत्मसमर्पण करने वाले इन लोगों ने आदिवासियों के मूल मुद्दों जैसे जल, जंगल और जमीन के लिए कभी कोई सार्थक काम नहीं किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इन लोगों की सक्रियता केवल दिखावा थी और इन्होंने कभी भी स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा नहीं की। कुंजाम के अनुसार, सरेंडर करने वाले कई लोग केवल अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा और सुविधाओं के लिए मुख्यधारा में लौट रहे हैं।

खदानों के विरोध का ‘डील’ कनेक्शन: आंदोलन खत्म करने के पीछे बड़ा खेल

कुंजाम ने एक और गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि नक्सली अक्सर खदान परियोजनाओं के खिलाफ बड़े-बड़े आंदोलन खड़े करते थे, लेकिन बाद में उनका विरोध अचानक गायब हो जाता था। उन्होंने दावा किया कि बड़ी कंपनियों के साथ भारी-भरकम “डील” होने के बाद नक्सली खदानों का रास्ता साफ कर देते थे। इसके बाद बेरोकटोक काम शुरू हो जाता था। उन्होंने इसे आदिवासियों के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात बताया, क्योंकि इससे स्थानीय लोगों को अपनी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से हाथ धोना पड़ा।

सरेंडर के पीछे की असली वजह: इनाम की राशि और सरकारी नीति पर उठाए सवाल

पूर्व विधायक ने हालिया आत्मसमर्पण के मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि कुछ नक्सलियों ने किसी सरकारी नीति से प्रभावित होकर नहीं, बल्कि अन्य निजी कारणों और दबाव में आकर हथियार डाले हैं। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि आत्मसमर्पण करने वाले कुछ चुनिंदा नक्सलियों को घोषित इनाम के अलावा अतिरिक्त मोटी रकम भी दी गई है। उन्होंने पूछा कि आखिर किस आधार पर इन लोगों को अतिरिक्त लाभ दिए जा रहे हैं और इसके पीछे की मंशा क्या है।

आदिवासियों से विश्वासघात: संसाधनों की लूट पर चुप्पी क्यों?

मनीष कुंजाम ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि इन तमाम घटनाओं से सबसे ज्यादा नुकसान स्थानीय आदिवासियों को हुआ है। एक तरफ नक्सली उन्हें ढाल बनाकर अपनी रोटियां सेंकते रहे, तो दूसरी तरफ कथित सौदेबाजी के चलते उनकी जमीनें छिनती गईं। उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है कि बस्तर के विकास और सुरक्षा के नाम पर चल रहे इस दोहरे खेल का पर्दाफाश हो। उन्होंने प्रशासन से अपील की कि वह केवल आंकड़ों के पीछे न भागे, बल्कि धरातल पर आदिवासियों को उनका हक दिलाए।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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