
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अब तक का सबसे कड़ा रुख अपनाते हुए पूरी दुनिया को चौंका दिया है। शनिवार को वाशिंगटन से जारी एक बयान में ट्रंप ने ईरान को साफ शब्दों में चेतावनी दी कि उसके पास समझौता करने के लिए अब सिर्फ 48 घंटे का समय बचा है। राष्ट्रपति के इस अल्टीमेटम ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में खलबली मचा दी है। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर इस तय समय सीमा के भीतर कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता, तो ईरान को बेहद भयावह स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
आखिरी मोहलत या सीधी जंग: 48 घंटे में फैसला करने का दबाव
Trump Ultimatum Iran 48 Hours: डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान ईरान के लिए अंतिम चेतावनी माना जा रहा है। इससे पहले भी उन्होंने ईरान को 10 दिन का समय दिया था, लेकिन अब यह मामला घंटों पर सिमट आया है। ट्रंप प्रशासन की मुख्य मांग यह है कि ईरान या तो अमेरिका की शर्तों पर समझौता करे या फिर सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए पूरी तरह खोल दे। ट्रंप का मानना है कि यदि अमेरिका को वहां नियंत्रण मिलता है, तो वे तेल आपूर्ति बहाल कर बड़ा आर्थिक मुनाफा कमा सकते हैं।
दावों पर उठे सवाल: ईरान ने गिराया अमेरिकी लड़ाकू विमान
एक तरफ राष्ट्रपति ट्रंप दावा कर रहे हैं कि अमेरिकी हमलों ने ईरान की सेना और रडार सिस्टम को पूरी तरह पंगु बना दिया है। दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। शुक्रवार को ईरान ने एक अमेरिकी लड़ाकू विमान को मार गिराया, जिसने पेंटागन की चिंता बढ़ा दी है। इस घटना में एक अमेरिकी पायलट को सुरक्षित बचा लिया गया है, जबकि दूसरे की तलाश अभी भी जारी है। इस जवाबी कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि ईरान अब भी पलटवार करने की क्षमता रखता है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर अकेला पड़ा अमेरिका: नाटो देशों ने खींचे हाथ
ईरान के साथ बढ़ते इस तनाव के बीच अमेरिका खुद को वैश्विक स्तर पर अकेला महसूस कर रहा है। ट्रंप के इस आक्रामक रुख का उनके पुराने सहयोगियों ने भी समर्थन करने से मना कर दिया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने दोटूक कह दिया है कि वे इस युद्ध का हिस्सा नहीं बनेंगे। मैक्रों का तर्क है कि अमेरिका ने बिना किसी सलाह-मशवरे के यह मोर्चा खोला है, इसलिए उसे मदद की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। नाटो के अन्य देशों ने भी इस सैन्य अभियान से दूरी बना ली है।
तेल बाजार में अनिश्चितता: वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल
ट्रंप के इस 48 घंटे के अल्टीमेटम का सीधा असर वैश्विक बाजार और तेल की कीमतों पर दिखना शुरू हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की तेल आपूर्ति का सबसे प्रमुख रास्ता है। अगर यहां युद्ध छिड़ता है, तो कच्चे तेल की सप्लाई पूरी तरह ठप हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यह धमकी न केवल मिडिल ईस्ट को आग में झोंक सकती है, बल्कि दुनिया भर में महंगाई का नया दौर भी ला सकती है। भारत सहित कई एशियाई देश जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर निर्भर हैं, वे इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए हैं।
घरेलू स्तर पर भी ट्रंप की आलोचना: रणनीतिक चूक बता रहे विशेषज्ञ
सिर्फ विदेश में ही नहीं, बल्कि अमेरिका के भीतर भी ट्रंप के इस फैसले की तीखी आलोचना हो रही है। विपक्षी नेताओं और सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि बिना सहयोगियों के भरोसे के युद्ध की धमकी देना आत्मघाती कदम हो सकता है। जानकारों के मुताबिक, ईरान को ‘नरक’ बनाने की चेतावनी देना आसान है, लेकिन एक साथ कई मोर्चों पर लड़ना अमेरिकी सेना के लिए भी बड़ी चुनौती होगी। ट्रंप पर आरोप लग रहे हैं कि वे कूटनीति के बजाय दबाव की राजनीति कर रहे हैं, जो सफल होती नहीं दिख रही है।
क्या टल जाएगा महायुद्ध: दुनिया की नजरें अब तेहरान पर
अब पूरी दुनिया की निगाहें ईरान के जवाब पर टिकी हैं। क्या ईरान ट्रंप की शर्तों के आगे झुकेगा या फिर 48 घंटे खत्म होने के बाद मिडिल ईस्ट में एक बड़े युद्ध की शुरुआत होगी? तेहरान ने अब तक समझौते के संकेत नहीं दिए हैं, बल्कि अपनी रक्षा प्रणाली को और मजबूत करने का दावा किया है। अगर कूटनीतिक रास्ते बंद होते हैं, तो आने वाले दो दिन इतिहास के सबसे तनावपूर्ण दिन साबित हो सकते हैं। शांति की अपील करने वाले देश अब मध्यस्थता की कोशिशों में जुटे हैं ताकि इस विनाशकारी टकराव को टाला जा सके।



