
भारत की आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर एक ऐतिहासिक और सुकून देने वाली रिपोर्ट सामने आई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में ‘लाल गलियारा’ यानी नक्सल प्रभावित क्षेत्र अब अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। साल 2014 में जहां नक्सलवाद देश के 126 जिलों में अपनी जड़ें जमाए हुए था, वहीं 2026 की ताजा रिपोर्ट में यह आंकड़ा घटकर मात्र 2 जिलों तक सीमित रह गया है। गृह मंत्रालय के इस नए वर्गीकरण ने साफ कर दिया है कि दशकों से देश की सुरक्षा के लिए चुनौती बना नक्सली नेटवर्क अब ढहने की कगार पर है।
12 साल में बड़ा बदलाव: 126 से घटकर 2 जिलों पर सिमटा दायरा
पिछले एक दशक में सुरक्षाबलों की रणनीति और सरकार की विकास योजनाओं ने नक्सलवाद की कमर तोड़ दी है। साल 2014 के मुकाबले प्रभावित जिलों की संख्या में लगभग 98 प्रतिशत की कमी आई है। आंकड़ों की जुबानी कहें तो यह 12 साल की लंबी और कठिन लड़ाई का नतीजा है। गृह मंत्रालय ने अब अधिकांश पुराने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को इस श्रेणी से बाहर कर दिया है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि खुफिया तंत्र की मजबूती और आधुनिक हथियारों से लैस जवानों ने नक्सलियों को उनके सुरक्षित ठिकानों से बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया है।
बीजापुर और पश्चिम सिंहभूम: अब बचे हैं नक्सलवाद के आखिरी दो गढ़
ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अब केवल छत्तीसगढ़ का बीजापुर और झारखंड का पश्चिम सिंहभूम ही पूर्ण रूप से नक्सल प्रभावित (LWE Affected) श्रेणी में बचे हैं। इन दो जिलों के अलावा छत्तीसगढ़ के ही कांकेर जिले को ‘डिस्ट्रिक्ट ऑफ कन्सर्न’ यानी चिंताजनक जिले की श्रेणी में रखा गया है। यह सुरक्षाबलों के लिए बड़ी उपलब्धि है कि जो आतंक कभी दर्जनों राज्यों में फैला था, वह अब केवल दो मुख्य केंद्रों तक सिमट गया है। इन इलाकों में भी अब घेराबंदी तेज कर दी गई है ताकि नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया किया जा सके।
बस्तर और अबूझमाड़ की बदली सूरत: हिंसा की जगह अब विकास का शोर
छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग, जिसे कभी नक्सलवाद का ‘कैपिटल’ कहा जाता था, अब पूरी तरह बदल रहा है। बस्तर के अधिकांश जिलों को अब ‘लीगेसी जिलों’ की श्रेणी में डाल दिया गया है। इसका मतलब है कि इन इलाकों में अब नक्सली हिंसा न के बराबर है। सरकार का पूरा ध्यान अब बंदूक की जगह स्कूल, सड़क, बिजली और अस्पताल जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण पर शिफ्ट हो गया है। अबूझमाड़ के जंगलों में भी अब विकास की किरणें पहुंच रही हैं, जिससे स्थानीय ग्रामीणों का भरोसा मुख्यधारा पर बढ़ा है।
तीन गुना बढ़ा सुरक्षा बजट: फंड और सटीक रणनीति से मिली कामयाबी
नक्सलवाद के खिलाफ इस बड़ी जीत के पीछे आर्थिक और रणनीतिक मजबूती का बड़ा हाथ है। सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) योजना के तहत मिलने वाले फंड को पिछले वर्षों में तीन गुना तक बढ़ाया गया है। इस राशि का उपयोग सुरक्षाबलों के लिए आधुनिक कैंप बनाने, बेहतर संचार उपकरण खरीदने और जवानों की ट्रेनिंग पर किया गया। इसके साथ ही सरकार की आत्मसमर्पण नीति ने भी कमाल दिखाया है। पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड संख्या में नक्सलियों ने हथियार डालकर समाज की मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है।
एकजुट भारत का प्रमाण: केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय
इस सफलता का श्रेय केंद्र और राज्य सरकारों के बीच हुए निर्बाध तालमेल को भी जाता है। भाजपा छत्तीसगढ़ ने सोशल मीडिया पर इस बदलाव को ‘युगांतरकारी परिवर्तन’ बताया है। पार्टी का कहना है कि यह केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ संकल्प के साथ बड़े से बड़ा लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। सुरक्षा बलों के अदम्य साहस और राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण ही आज लाल आतंक का खौफ खत्म होने के करीब है। यह नए भारत की सुरक्षा नीति की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।
आगे की राह: अंतिम वार की तैयारी में जुटे सुरक्षाबल
भले ही नक्सलवाद अब सिर्फ दो जिलों में बचा है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं हैं। बीजापुर और पश्चिम सिंहभूम के जंगलों में अंतिम प्रहार की तैयारी चल रही है। इन आखिरी गढ़ों में नक्सलियों की सप्लाई चेन को काट दिया गया है। गृह मंत्रालय का लक्ष्य है कि आने वाले समय में भारत को पूरी तरह नक्सल मुक्त घोषित किया जाए। जैसे-जैसे इन बचे हुए इलाकों में सड़कें पहुंच रही हैं, नक्सलियों के छिपने की जगहें खत्म होती जा रही हैं। भारत अब लाल आतंक के पूरी तरह अंत की ओर बढ़ रहा है।



