
छत्तीसगढ़ के उद्यानिकी विभाग में भ्रष्टाचार के नए आरोपों ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। अमानक बीज सप्लाई के मामले की जांच अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि अब एचडीपीई (HDPE) वर्मी बेड की खरीदी में बड़ी धांधली का मामला सामने आया है। प्रदेश कांग्रेस ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे सरकारी खजाने की खुली लूट करार दिया है। विपक्षी दल का दावा है कि किसानों के नाम पर आई राशि का बंदरबांट करने के लिए बाजार दर से कई गुना अधिक कीमत पर घटिया सामान खरीदा गया है।
कौड़ियों का दाम और सोने का भाव: 8 गुना महंगी खरीदी का दावा
कांग्रेस द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक जेम (GeM) पोर्टल पर जिस ब्रांड का वर्मी बेड मात्र 2,000 रुपये में उपलब्ध है, विभाग ने उसे 16,500 रुपये प्रति नग की दर से खरीदा है। आरोप है कि एआर इंटरप्राइजेस नामक फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए बाजार मूल्य की अनदेखी की गई। महज 2 हजार की वस्तु के लिए साढ़े 16 हजार रुपये चुकाना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। पार्टी के प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने तंज कसते हुए कहा कि सरकारी तंत्र में पारदर्शिता के लिए बना जेम पोर्टल अब घोटाले का जरिया बन चुका है।
कंपनियों का ‘कार्टेल’ और अफसरों की मिलीभगत: मिलीभगत का आरोप
इस पूरे खेल में केवल एक कंपनी ही नहीं बल्कि कई फर्मों के शामिल होने की बात कही जा रही है। आरोप है कि एआर इंटरप्राइजेस, आर्मी इन्फोटेक और विश कम्प्यूटर्स जैसी कंपनियों ने आपस में साठगांठ कर कीमतें तय की थीं ताकि निविदा प्रक्रिया में कोई और शामिल न हो सके। इस ‘कार्टेल’ को विभागीय अधिकारियों का भी संरक्षण मिलने का दावा किया जा रहा है। कांग्रेस का कहना है कि महासमुंद समेत कई अन्य जिलों में भी इसी पैटर्न पर करोड़ों रुपये की खरीदी की गई है, जिसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।
मार्च की जल्दबाजी और पारदर्शिता पर सवाल: वित्तीय वर्ष के अंत में खेल
यह पूरी खरीदी केंद्र सरकार से जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए मिले फंड से की जानी थी। नियम के मुताबिक यह पैसा किसानों के हित में खर्च होना था, लेकिन वित्तीय वर्ष की समाप्ति से ठीक पहले आनन-फानन में आर्डर जारी किए गए। कांग्रेस का आरोप है कि बजट को खपाने और कमीशनखोरी के चक्कर में नियमों को ताक पर रखकर यह सौदा किया गया। पार्टी ने मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों से सरकारी पैसे की वसूली की जाए और संबंधित कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया जाए।
जैविक खेती के नाम पर खिलवाड़: किसानों को कितना होगा फायदा?
एक तरफ सरकार प्रदेश में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए वर्मी कंपोस्टिंग और केंचुआ खाद के प्रयोग पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं की खरीदी में ही धांधली हो रही है। यदि वर्मी बेड जैसी साधारण चीज इतनी महंगी खरीदी जाएगी, तो योजना का वास्तविक लाभ अंतिम छोर पर बैठे किसान तक कैसे पहुंचेगा? जानकारों का कहना है कि अगर इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह प्रदेश के कृषि विकास के मॉडल पर एक बड़ा धब्बा है। फिलहाल अब सबकी नजरें सरकार के जवाब और संभावित जांच पर टिकी हैं।



