
CG Religious Conversion RTI Report: छत्तीसगढ़ में इन दिनों डी-लिस्टिंग और मतांतरण (धर्म परिवर्तन) के मुद्दे पर छिड़ी सियासी बहस के बीच बस्तर जिले से बेहद चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत जिला प्रशासन से मिले दस्तावेजों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के गठन से लेकर साल 2023 तक बस्तर जिले में केवल 364 लोगों ने ही स्वेच्छा से धर्म बदलने की आधिकारिक सूचना प्रशासन को दी है। इसके विपरीत जमीनी हकीकत यह है कि इसी अवधि के दौरान बस्तर संभाग के विभिन्न गांवों और कस्बों में चर्चों और प्रार्थना केंद्रों की संख्या बढ़कर डेढ़ हजार से अधिक हो गई है। कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का यह भारी अंतर अब चर्चा का मुख्य विषय बन गया है।
सर्व आदिवासी समाज ने आरटीआई से खंगाला रिकॉर्ड, प्रशासन के पास 2023 के बाद का डेटा नहीं
यह पूरा मामला तब प्रकाश में आया जब सर्व आदिवासी समाज ने आदिवासी अंचलों में हो रहे मतांतरण की वास्तविक स्थिति जानने के लिए जिला प्रशासन के समक्ष आरटीआई आवेदन लगाया था। समाज ने वर्ष 2025 तक के पूरे आंकड़े मांगे थे। इसके जवाब में बस्तर जिला प्रशासन ने जो दस्तावेज सौंपे, वे नवंबर 2000 से फरवरी 2023 तक के ही थे। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि फरवरी 2023 के बाद से उनके पास धर्म परिवर्तन से संबंधित कोई नया आधिकारिक रिकॉर्ड या डेटा उपलब्ध नहीं है। आदिवासी संगठनों का आरोप है कि वास्तविक रूप से मतांतरण करने वालों की संख्या हजारों में है, लेकिन सरकारी फाइलों में इसे जानबूझकर छिपाया जा रहा है।
सादे कागज और हलफनामे पर दी गई जानकारी, सरकारी तंत्र ने आगे की कागजी प्रक्रिया की सुध नहीं ली
दस्तावेजों के विश्लेषण से यह बात भी सामने आई है कि जिन 364 लोगों ने प्रशासन को सूचना दी थी, उनमें से अधिकांश ने बेहद गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम किया। नियमों के मुताबिक धर्म परिवर्तन की एक तय और अनिवार्य वैधानिक प्रक्रिया होती है, जिसका पालन करना जरूरी है। लेकिन बस्तर में ज्यादातर लोगों ने केवल एक सादे कागज पर आवेदन लिखकर या मामूली शपथ पत्र (हलफनामा) जमा करके अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली। जिला प्रशासन ने इन आवेदनों को अपने रजिस्टर में दर्ज तो कर लिया, लेकिन इसके बाद उन व्यक्तियों ने कानून के तहत अपनी आगे की जरूरी औपचारिकताएं पूरी कीं या नहीं, इसकी जांच करने की सुध विभागीय अधिकारियों ने नहीं ली।
गांव-गांव में जानकारी जुटा रहा है आदिवासी समाज, मिशनरियों के बढ़ते प्रभाव पर जताई गंभीर चिंता
आरटीआई से मिले इन अधूरे आंकड़ों के बाद अब सर्व आदिवासी समाज ने अपने स्तर पर जमीनी हकीकत का पता लगाने का फैसला किया है। समाज के जिला अध्यक्ष दशरथ कश्यप ने बताया कि अब युवा कार्यकर्ता ब्लॉक और पंचायत स्तर पर जाकर हर गांव से मतांतरित लोगों और वहां बने अवैध प्रार्थना भवनों की वास्तविक सूची तैयार कर रहे हैं। वहीं संगठन के प्रांतीय कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व विधायक राजाराम तोड़ेम ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि सरकारी तंत्र के पास मतांतरित लोगों की पूरी और सटीक जानकारी न होने के कारण ही अंदरूनी इलाकों में मिशनरियों का प्रभाव लगातार पैर पसार रहा है, जिससे स्थानीय संतुलन बिगड़ रहा है।

संस्कृति को बचाने के लिए आरक्षण खत्म करने की मांग, दोहरी सुविधाओं का उठाया जा रहा है फायदा
वनवासी कल्याण आश्रम के प्रांत संगठन मंत्री रामनाथ कश्यप ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि बिना नियंत्रण के हो रहा धर्म परिवर्तन बस्तर की प्राचीन जनजातीय संस्कृति, रीति-रिवाजों और लोक परंपराओं के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। उन्होंने वर्तमान कानूनी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि धर्म बदलने वाले लोग एक तरफ तो अल्पसंख्यक होने के विशेष दर्जे का लाभ उठा रहे हैं और दूसरी तरफ आदिवासी कोटे के तहत मिलने वाले आरक्षण की मलाई भी खा रहे हैं। इस दोहरे लाभ की व्यवस्था पर जब तक पूरी तरह से कानूनी रोक नहीं लगेगी और उनका आरक्षण समाप्त नहीं होगा, तब तक इस अवैध खेल को रोकना नामुमकिन है।
जिला प्रशासन और खुफिया विभाग अलर्ट, अंदरूनी इलाकों में प्रार्थना केंद्रों की हो रही है पहचान
बस्तर में सामाजिक संगठनों के बढ़ते दबाव और आरटीआई के इन विरोधाभासी आंकड़ों के सामने आने के बाद अब जिला प्रशासन और खुफिया एजेंसियां भी सतर्क हो गई हैं। राजस्व विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में बने नए प्रार्थना केंद्रों और चर्चों की भूमि रजिस्ट्री और उनके निर्माण की अनुमति संबंधी दस्तावेजों की जांच करें। पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीमें अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि बिना आधिकारिक सूचना के इतने बड़े पैमाने पर सामाजिक बदलाव कैसे हो गया। आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर बस्तर की स्थानीय राजनीति में टकराव और बढ़ने के आसार दिखाई दे रहे हैं।



