अटल बिहारी वाजपेयी यूनिवर्सिटी में ‘घोटाला’: भर्ती से लेकर खरीदी तक में मची लूट, जांच समिति की रिपोर्ट ने खोली अफसरों की पोल

बिलासपुर स्थित अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय एक बार फिर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गया है। फर्नीचर खरीदी में करीब 92 लाख रुपये के गबन के बाद अब भर्ती और अन्य उपकरणों की खरीदी में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की बात सामने आई है। जांच समिति की हालिया रिपोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अफसरों ने निजी लाभ के लिए न केवल सरकारी खजाने को चूना लगाया, बल्कि भर्ती के नियमों और आरक्षण रोस्टर को भी अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ दिया।

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आरक्षण रोस्टर में खेल: चहेतों को उपकृत करने के लिए बदले भर्ती के नियम

जांच समिति की पड़ताल में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि विश्वविद्यालय ने अलग-अलग समय पर भर्ती के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाए। साल 2012-14 के दौरान हुई भर्तियों में प्रत्येक विभाग को एक अलग इकाई मानकर आरक्षण लागू किया गया। वहीं, साल 2023-25 की भर्तियों में पूरे विश्वविद्यालय को एक इकाई मानकर 100 बिंदु रोस्टर लागू कर दिया गया। एक ही संस्थान में दो अलग-अलग नियमों का पालन करना इस बात की ओर इशारा करता है कि कुछ खास लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों के साथ खिलवाड़ किया गया है।

होटल मैनेजमेंट विभाग में विसंगति: यूजीसी और एआईसीटीई के नियमों की अनदेखी

यूनिवर्सिटी के होटल मैनेजमेंट एंड हॉस्पिटैलिटी विभाग में की गई नियुक्तियों में भारी अनियमितता पाई गई है। वर्तमान नियुक्तियों में विश्वविद्यालय ने यूजीसी रेगुलेशन 2018 का हवाला दिया है, जबकि पिछली भर्तियों में एआईसीटीई के नियमों का पालन किया गया था। जांच कमेटी ने इस विरोधाभास पर आपत्ति जताते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से लिखित स्पष्टीकरण मांगा है। इसके अलावा, कॉमर्स और मैनेजमेंट विभाग में हुई नियुक्तियों का मामला फिलहाल हाईकोर्ट में लंबित है, जिसके चलते समिति ने इस पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है।

निज सहायक की ‘फर्जी’ नियुक्ति: संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर मिली सरकारी नौकरी

अशैक्षणिक पदों पर हुई नियुक्तियों में उपेन चंद्राकर की निज सहायक (PA) के पद पर बहाली सबसे ज्यादा विवादों में है। जांच समिति ने पाया कि जिस प्रमाण पत्र और दस्तावेजों के आधार पर यह नियुक्ति की गई है, उनकी मान्यता पूरी तरह संदिग्ध है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा है कि ऐसी नियुक्ति नियमों के दायरे में उचित नहीं है। इस फर्जीवाड़े ने विश्वविद्यालय की चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़ा दाग लगा दिया है, जिसकी अब गहराई से जांच की सिफारिश की गई है।

ई-निविदा को ठेंगा: कंप्यूटर और ट्रैक्टर खरीदी में अपनाई मनमानी प्रक्रिया

नियमों के मुताबिक 50 लाख रुपये से अधिक की खरीदी के लिए खुली निविदा (टेंडर) जारी करना अनिवार्य है। हालांकि, विश्वविद्यालय के अफसरों ने कंप्यूटर क्रय करने के लिए इस प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया। इतना ही नहीं, ई-रिक्शा और ट्रैक्टर ट्रॉली जैसी गाड़ियों की खरीदी में भी उचित टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। जांच समिति का मानना है कि ई-मानक पोर्टल का सहारा लेकर बड़ी राशि के कंप्यूटर खरीदना वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन है, जिस पर अफसरों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

वित्त विभाग की अनदेखी: बिना अनुमति कर्मचारियों को बांटा गया ‘एक्स्ट्रा’ वेतन

विश्वविद्यालय के वार्षिक बजट निर्माण में लगे अधिकारियों और कर्मचारियों को साल में एक महीने का अतिरिक्त वेतन (बोनस) दिया जा रहा था। जांच में पाया गया कि इस भुगतान के लिए छत्तीसगढ़ शासन के वित्त विभाग से कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी। बिना सरकारी मंजूरी के राजकोष से अतिरिक्त वेतन बांटना वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है। समिति ने इस भुगतान को अनुचित बताते हुए संबंधितों पर कार्रवाई की ओर संकेत दिया है।

50 लाख का एडवांस भुगतान: मुंबई की फर्म से बिना काम लिए ही निरस्त किया अनुबंध

ऑनलाइन सेवाओं के लिए साल 2023 में मुंबई की एक कंपनी ‘IUMS’ के साथ अनुबंध किया गया था। हैरानी की बात यह है कि बिना कोई काम लिए ही यूनिवर्सिटी ने कंपनी को 50 लाख रुपये का अग्रिम भुगतान (एडवांस) कर दिया। मात्र 3-4 महीने बाद ही इस अनुबंध को अचानक निरस्त कर दिया गया और पुरानी फर्म से काम लिया जाने लगा। जांच समिति ने इस एडवांस भुगतान को पूरी तरह गलत ठहराया है और इस राशि की तत्काल वसूली करने के निर्देश दिए हैं।

कुलसचिव के प्रभार पर फैसला: शैलेंद्र दुबे को पद से हटाना बताया गया सही

विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव के पद पर पदोन्नत हुए शैलेंद्र दुबे को कुलपति के अनुमोदन से कुलसचिव का कार्यभार सौंपा गया था। हालांकि, हाल ही में उन्हें इस महत्वपूर्ण पद के प्रभार से मुक्त कर दिया गया है। जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस फैसले को उचित ठहराया है। प्रशासनिक दृष्टिकोण से इसे एक सुधारात्मक कदम माना जा रहा है, क्योंकि कुलसचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियमित और अनुभवी अधिकारी की नियुक्ति ही संस्थान के हित में होती है।

जांच समिति का गठन: इन विशेषज्ञों ने तैयार की घोटाले की कच्ची रिपोर्ट

इस पूरे घोटाले की तह तक पहुंचने के लिए उच्च शिक्षा संचालनालय ने एक उच्च स्तरीय पांच सदस्यीय समिति का गठन किया था। इस समिति के अध्यक्ष डॉ. डी.एस. जगत (अतिरिक्त संचालक) थे। सदस्यों में डॉ. राजेश पांडेय, डॉ. अमिताभ बैनर्जी, डॉ. डी.के. श्रीवास्तव और डॉ. गोवर्धन यदु शामिल थे। इस टीम ने शैक्षणिक और अशैक्षणिक पदों पर भर्ती, उपकरणों की खरीदी और रेनोवेशन कार्यों से संबंधित सैकड़ों फाइलों को खंगालने के बाद यह रिपोर्ट शासन को सौंपी है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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