
छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले में भारतीय सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल खजाना सामने आया है। जिला प्रशासन द्वारा पुरानी धरोहरों को सहेजने के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान के दौरान गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ की लगभग 300 साल पुरानी एक दुर्लभ पांडुलिपि मिली है। पूर्णतः अवधी भाषा में हाथ से लिखी गई यह प्रति न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि ऐतिहासिक और भाषाई शोध के नजरिए से भी इसे बेहद कीमती माना जा रहा है। इस खोज ने पुरातत्व प्रेमियों और इतिहासकारों के बीच हलचल पैदा कर दी है।

पीढ़ियों से उपाध्याय परिवार ने संजोकर रखी थी यह विरासत
यह बेशकीमती पांडुलिपि गौरेला के धनौली निवासी ज्ञानेंद्र उपाध्याय के परिवार के पास सुरक्षित थी। उपाध्याय परिवार ने इस ऐतिहासिक धरोहर को पीढ़ियों से अपनी अमूल्य थाती मानकर सहेज कर रखा था। परिवार के सदस्यों का कहना है कि उनके परदादा और दादा इस रामायण का नियमित रूप से पाठ और अध्ययन किया करते थे। जिला प्रशासन और पुरातत्व विभाग की ओर से प्राचीन दस्तावेजों को संरक्षित करने की अपील किए जाने के बाद, परिवार ने इस सांस्कृतिक वैभव को सार्वजनिक हित में कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत किया।
प्राचीन अवधी भाषा का अद्भुत नमूना है यह हस्तलिखित ग्रंथ
विशेषज्ञों के अनुसार, 300 साल पहले हस्तलिखित यह पांडुलिपि उस समय की लेखन शैली और अवधी भाषा की सूक्ष्मता को दर्शाती है। हालांकि वर्तमान पीढ़ी के लिए इस प्राचीन लिखावट और भाषा के स्वरूप को समझना थोड़ा चुनौतीपूर्ण है, लेकिन शोधकर्ताओं के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है। पांडुलिपि की स्याही और कागज की गुणवत्ता आज भी काफी हद तक सुरक्षित है। प्रशासन अब इसे वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग कर संरक्षित करने की तैयारी कर रहा है ताकि इसे लंबे समय तक खराब होने से बचाया जा सके।

‘ज्ञानभारतम’ अभियान के तहत हो रहा है पांडुलिपियों का संकलन
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में यह सफलता भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित ‘ज्ञानभारतम’ राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान के तहत मिली है। इस मुहिम का मुख्य उद्देश्य देश के अलग-अलग कोनों में बिखरी हुई प्राचीन और दुर्लभ पांडुलिपियों की पहचान करना और उनका दस्तावेजीकरण करना है। जिले के विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों पर सर्वेक्षण कर ऐसी ही अन्य महत्वपूर्ण प्रतियों को जुटाया जा रहा है। इस खोज को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
डिजिटल संरक्षण के जरिए आने वाली पीढ़ी देख सकेगी वैभव
कलेक्टर और पुरातत्व विभाग ने इस पांडुलिपि के डिजिटल संरक्षण की योजना बनाई है। इसके तहत प्रत्येक पन्ने की हाई-रेजोल्यूशन इमेजिंग की जाएगी ताकि मूल प्रति को सुरक्षित रखते हुए इसके कंटेंट को सार्वजनिक किया जा सके। जिला प्रशासन का मानना है कि इस तरह के प्रयासों से आने वाली पीढ़ियां हमारे पूर्वजों के ज्ञान और भाषाई कौशल को करीब से जान सकेंगी। ज्ञानेंद्र उपाध्याय के परिवार द्वारा इस प्रति को प्रशासन को सौंपने के फैसले की हर तरफ सराहना हो रही है।
ऐतिहासिक और भाषाई शोध के खुलेंगे नए द्वार
इतिहासकारों का कहना है कि 300 साल पुरानी यह प्रति गोस्वामी तुलसीदास द्वारा मूल रूप से रचित रामचरितमानस के पाठों के तुलनात्मक अध्ययन में सहायक सिद्ध हो सकती है। यह पांडुलिपि मध्यकालीन छत्तीसगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित अवधी के प्रभाव को भी उजागर करती है। प्रशासन का अगला कदम इस पांडुलिपि का व्यापक स्तर पर दस्तावेजीकरण करना है, जिससे भविष्य में छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव को राष्ट्रीय पटल पर नई पहचान मिल सकेगी।
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