Swachh Anudan Yojana: जनता के पैसों पर नेताओं की मेहरबानी: स्वेच्छानुदान की राशि और अपात्रों की चांदी

Swachh Anudan Yojana: छत्तीसगढ़ में जनप्रतिनिधियों को हर साल एक बड़ी धनराशि स्वेच्छानुदान के रूप में दी जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य उन गरीब लोगों की मदद करना है जो अचानक किसी गंभीर बीमारी या दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। लेकिन हकीकत में यह राशि अक्सर जरूरतमंदों तक पहुँचने के बजाय रसूखदारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की जेब में जा रही है।

क्या है स्वेच्छानुदान और इसका असली मकसद

नियमों के अनुसार स्वेच्छानुदान की राशि का उपयोग केवल उन लोगों के लिए किया जा सकता है जिन्हें तत्काल आर्थिक सहायता की जरूरत होती है। इसमें शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं ताकि कोई गरीब व्यक्ति इलाज या पढ़ाई से वंचित न रह जाए। यह पैसा सीधे तौर पर जनता की भलाई के लिए सुरक्षित रखा जाता है।

जरूरतमंदों के हक पर रसूखदारों का कब्जा

राज्य में अक्सर यह आरोप लगते हैं कि विधायक और मंत्री अपनी इस शक्ति का गलत इस्तेमाल करते हैं। वे अपने करीबियों और समर्थकों को खुश करने के लिए इस राशि को ईनाम की तरह बांट देते हैं। इसकी वजह से वे लोग पीछे छूट जाते हैं जिन्हें वास्तव में इस सरकारी मदद की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

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स्वास्थ्य मंत्री पर लगे गंभीर वित्तीय आरोप

मनेंद्रगढ़ के विधायक और प्रदेश के वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल इस समय विवादों के केंद्र में हैं। आरटीआई कार्यकर्ता राजकुमार मिश्रा ने दस्तावेजों के साथ यह शिकायत की है कि मंत्री ने अपनी निधि का दुरुपयोग किया है। उनके अनुसार मंत्री ने अपने करीबियों और कार्यकर्ताओं को लाभ पहुँचाने के लिए नियमों को ताक पर रख दिया है।

बुजुर्गों को पढ़ाई के नाम पर मिली आर्थिक मदद

जाँच रिपोर्ट में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है जिसमें कुछ बुजुर्ग महिलाओं और पुरुषों को शिक्षा के नाम पर 20-20 हजार रुपये दिए गए हैं। ये लोग न तो किसी स्कूल में पढ़ते हैं और न ही किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। शिक्षा के नाम पर इन लोगों को पैसा देना सीधे तौर पर सरकारी खजाने की बर्बादी माना जा रहा है।

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रईस कर्मचारियों पर सरकारी खजाने से मेहरबानी

आरोपों के मुताबिक एसईसीएल जैसे संस्थानों में काम करने वाले उन कर्मचारियों को भी सहायता दी गई है जिनका मासिक वेतन एक लाख रुपये से भी अधिक है। इन लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर सरकारी फंड दिया गया है जो पूरी तरह से नियम विरुद्ध है। यह दिखाता है कि बिना किसी जाँच के सिर्फ संपर्कों के आधार पर पैसा लुटाया गया है।

एक ही परिवार के कई सदस्य साथ हुए बीमार

दस्तावेजों में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है जहाँ एक ही घर के पांच सदस्यों को एक साथ बीमार दिखाया गया। इसके बाद प्रत्येक सदस्य के लिए 25-25 हजार रुपये की सहायता राशि मंजूर की गई। इस तरह से सवा लाख रुपये की बड़ी रकम एक ही परिवार को दे दी गई जो भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है।

पुराने नेताओं के दौर में भी हुई जमकर बंदरबांट

यह समस्या केवल वर्तमान समय की नहीं है बल्कि पिछली सरकारों में भी यही हाल रहा है। पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल के कार्यकाल में भी ऐसी ही अनियमितताएं पाई गई थीं। उन्होंने अपनी निधि से उन लोगों को फायदा पहुँचाया जो आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम थे और जिनके पास खुद के आलीशान मकान और गाड़ियाँ थीं।

जब पत्रकार ने लौटाया स्वेच्छानुदान का चेक

डॉ. विनय जायसवाल के समय में एक ऐसा वाकया हुआ जो काफी चर्चा में रहा। उन्होंने अपने इलाके के पत्रकारों को भी यह राशि बांट दी थी। हालांकि एक वरिष्ठ पत्रकार ने उस चेक को यह कहते हुए वापस कर दिया कि उन्हें इसकी कोई जरूरत नहीं है। यह घटना दर्शाती है कि नेता किस तरह बेधड़क होकर सरकारी पैसे को खैरात की तरह बांटते हैं।

मुख्यमंत्री राहत राशि पर भी उठे कड़े सवाल

केवल मंत्रियों और विधायकों तक ही यह मामला सीमित नहीं है। गरियाबंद जिले के जिला पंचायत सदस्य संजय नेताम ने मुख्यमंत्री की स्वेच्छानुदान राशि पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने बाकायदा उन लोगों की लिस्ट दिखाई है जो इनकम टैक्स भरते हैं लेकिन फिर भी उन्हें सरकारी सहायता राशि प्रदान की गई है।

क्या कहते हैं सरकारी नियम और कायदे

नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं कि सरकारी अनुदान की राशि किसी की दया या निजी संपत्ति नहीं है। यह राज्य सरकार का पैसा है जिसे केवल सार्वजनिक हित में ही खर्च किया जा सकता है। भुगतान की गई राशि के बदले में उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा करना अनिवार्य होता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पैसा सही जगह लगा है।

केंद्र सरकार और ईओडब्ल्यू तक पहुंची शिकायत

इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए अब केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ शासन से जवाब मांगा है। साथ ही आर्थिक अपराध शाखा यानी ईओडब्ल्यू ने भी इस भ्रष्टाचार की जाँच शुरू कर दी है। जाँच एजेंसियां अब उन सभी फाइलों का मिलान कर रही हैं जिनमें अपात्रों को पैसा दिए जाने की संभावना है।

पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी चुनौती

इस पूरे प्रकरण से यह साफ है कि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच सांठगांठ के कारण गरीबों का पैसा लूटा जा रहा है। जब तक इस प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी नहीं बनाया जाएगा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी तब तक भ्रष्टाचार का यह खेल इसी तरह चलता रहेगा। जनता की गाढ़ी कमाई का इस तरह दुरुपयोग होना लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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