
CG Polythene Ban Bilaspur High Court Oder: छत्तीसगढ़ में सिंगल यूज प्लास्टिक और पॉलिथीन पर पूर्ण प्रतिबंध होने के बावजूद बाजारों में डिस्पोजेबल कप, ग्लास और थैलियों की धड़ल्ले से बिक्री हो रही है। इस लचर व्यवस्था पर बिलासपुर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने नाराजगी जताते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई है। अदालत ने सीधा सवाल किया कि जब नियम बने हुए हैं, तो यह प्रतिबंधित कचरा खुलेआम बाजारों तक कैसे पहुंच रहा है। कोर्ट ने इस मामले में जवाबदेही तय करते हुए शासन से पूरी रिपोर्ट तलब की है।
मुख्य सचिव को खुद देना होगा हलफनामा, 8 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य के मुख्य सचिव को खुद व्यक्तिगत रूप से जवाब देने के निर्देश दिए हैं। मुख्य सचिव को अब अदालत में शपथ पत्र (हलफनामा) दाखिल कर यह बताना होगा कि प्रतिबंध के नियमों का पालन कराने में प्रशासनिक तंत्र कहां चूक गया। सरकार को उन जिम्मेदार अधिकारियों की सूची और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई का ब्यौरा भी देना होगा जो इस अवैध कारोबार को रोकने में नाकाम रहे। इस मामले की अगली सुनवाई 8 जुलाई 2026 को तय की गई है, तब तक सरकार को अपना पूरा पक्ष रखना होगा।
पर्यावरण एक्टिविस्ट की याचिका से खुला राज, कागजों में बैन पर जमीन पर धंधा चालू
यह पूरा मामला पर्यावरण एक्टिविस्ट नितिन सिंघवी द्वारा दायर जनहित याचिका के बाद प्रकाश में आया है। याचिकाकर्ता ने पुख्ता प्रमाणों के साथ कोर्ट को बताया कि राज्य में डिस्पोजेबल प्लेट, चम्मच, स्ट्रॉ, थर्माकोल और प्लास्टिक की छोटी पानी बोतलों पर केवल कागजों में रोक लगी है। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। राजधानी रायपुर के मुख्य जयस्तंभ चौक से लेकर छोटे-मोटे रिहायशी इलाकों के बाजारों तक में यह प्रतिबंधित सामान आसानी से उपलब्ध है। त्योहारों, सार्वजनिक कार्यक्रमों और शादियों में तो इनका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है।
छोटे दुकानदारों पर चालान की खानापूर्ति बंद हो, बड़े सप्लायरों पर हो वार
याचिका में नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में कहा गया है कि निगम का दस्ता केवल गरीब ठेले वालों, सब्जी विक्रेताओं और छोटे दुकानदारों पर 500 या 1000 रुपये का जुर्माना करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। इस मामूली कार्रवाई से प्लास्टिक का यह सिंडिकेट खत्म होने वाला नहीं है। अगर सच में छत्तीसगढ़ को प्लास्टिक मुक्त बनाना है, तो उन बड़े थोक व्यापारियों और सप्लायरों को पकड़ना होगा जो दूसरे राज्यों से ट्रकों में माल भरकर ला रहे हैं। इसके लिए राज्य की सीमाओं पर ही जांच चौकियां मजबूत करनी होंगी।
फैक्ट्रियों के बिजली बिल और जीएसटी रिकॉर्ड खंगालने की उठी मांग
बाजार में आ रहे इस अवैध माल के स्रोत को नष्ट करने के लिए याचिकाकर्ता ने एक नया और व्यावहारिक सुझाव कोर्ट के सामने रखा है। मांग की गई है कि जिन प्लास्टिक फैक्ट्रियों को कागजों पर बंद दिखाया गया है, उनकी बिजली खपत की बारीकी से जांच की जाए। यदि कोई यूनिट बंद है, तो वहां भारी-भरकम बिजली का बिल कैसे आ रहा है। इसके साथ ही इन संदिग्ध कंपनियों के जीएसटी (GST) रिटर्न और बिक्री के रिकॉर्ड का मिलान भी किया जाना चाहिए ताकि उनके गुप्त टर्नओवर का पता चल सके।
पर्यावरण संरक्षण मंडल की सुस्ती उजागर, 6 महीने से दबा पड़ा है प्रस्ताव
इस पूरे मामले में सरकारी विभागों की आपसी सुस्ती भी सामने आई है। नवंबर 2025 में ही आवास और पर्यावरण विभाग ने छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल को एक हाई-पावर कमेटी बनाने का लिखित आदेश दिया था ताकि प्लास्टिक नियमों की कड़ाई से मॉनिटरिंग हो सके। हैरानी की बात यह है कि करीब छह महीने बीत जाने के बाद भी मंडल की ओर से शासन को कोई ठोस प्रस्ताव नहीं भेजा गया। इसी ढुलमुल रवैए का फायदा उठाकर प्लास्टिक माफिया बेखौफ होकर अपना जाल फैला रहा है।
ऑनलाइन फूड डिलीवरी और होटलों की पैकेजिंग की भी होगी कड़ाई से जांच
अदालत में यह मुद्दा भी गूंजा कि होटलों, रेस्तरां और ऑनलाइन फूड डिलीवरी करने वाली कंपनियां नियमों की आड़ में प्रतिबंधित प्लास्टिक पैकेजिंग का इस्तेमाल कर रही हैं। नियमों में दी गई तकनीकी छूट का गलत फायदा उठाकर गुपचुप तरीके से हानिकारक प्लास्टिक बाजार में खपाया जा रहा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्लास्टिक रेगुलेशन एक्ट 2020 और संशोधित नियम 2023 के तहत केवल औपचारिकता पूरी करने से काम नहीं चलेगा। जहरीले कचरे से पर्यावरण को बचाने के लिए अब उत्पादन करने वाली कंपनियों के खिलाफ सीधे दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।



