गोवर्धन पूजा 2025: आज भूलकर भी न करें ये काम, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा की सही विधि

Govardhan Puja 2025: दीपावली के ठीक अगले दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा का पर्व श्रद्धा, कृतज्ञता और प्रकृति के सम्मान का प्रतीक है। यह शुभ दिन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण के गिरधारी स्वरूप और गोवर्धन पर्वत को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्रदेव के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाया था। यह पर्व हमें प्रकृति, अन्न और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करने का संदेश देता है।

गोवर्धन पूजा के शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

गोवर्धन पूजा के दिन भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ गाय की पूजा, अन्नकूट का भोग और गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्व होता है। ये दिन जीवन में समृद्धि और विनम्रता का प्रतीक माना जाता है। उत्तर भारत के मथुरा, वृंदावन, बरसाना और गोकुल जैसे क्षेत्रों में यह पर्व खास उत्साह से मनाया जाता है।

पूजन का समयमुहूर्त
प्रातःकालसुबह 6:26 से 8:42 तक
दोपहरदोपहर 3:29 से 5:44 तक
शामशाम 5:44 से 6:10 तक

इन समयों में भगवान श्रीकृष्ण के गिरधारी स्वरूप की आराधना करना अत्यंत शुभ माना गया है।

गोवर्धन पूजन की सही विधि

गोवर्धन पूजा के लिए इन सरल चरणों का पालन करना चाहिए:

  1. गोवर्धन पर्वत का निर्माण: प्रातःकाल स्नान के बाद घर के आंगन या मुख्य द्वार पर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाएँ। इसके चारों ओर पेड़-पौधों, ग्वाल-बालों और गायों की आकृतियाँ बनाकर सजाएँ।
  2. श्रीकृष्ण स्थापना और भोग: पर्वत के बीच में श्रीकृष्ण की मूर्ति रखें और उनके सामने अन्नकूट का भोग लगाएँ। इस भोग में आमतौर पर 56 प्रकार के व्यंजन या गेहूं, चावल, कढ़ी, बाजरा और हरी सब्जियों से बने व्यंजन शामिल होते हैं।
  3. पूजा और परिक्रमा: पूजा के दौरान गोवर्धन पर्वत की सात बार परिक्रमा करें। पूजा के बाद कथा सुनें, प्रसाद वितरित करें और परिवार सहित भोजन करें।
  4. गौमाता का पूजन: इस दिन गौमाता को देवी लक्ष्मी का स्वरूप मानकर तिलक लगाएँ और हरा चारा खिचड़ी खिलाएँ।

आज गोवर्धन पूजा पर भूलकर भी न करें ये काम

गोवर्धन पूजा आस्था, कृतज्ञता और पर्यावरण के प्रति सम्मान का उत्सव है, इसलिए इस दिन कुछ कार्यों से बचना चाहिए:

  • तामसिक भोजन: मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन जैसे तामसिक भोजन का प्रयोग बिल्कुल न करें।
  • पेड़-पौधों को नुकसान: इस दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें और किसी भी पेड़ या पौधे को नुकसान न पहुँचाएँ, क्योंकि यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करता है।
  • अन्न की बर्बादी: अन्न या प्रसाद की बर्बादी न करें, अन्न का आदर करें।
  • अशुभ मानी जाने वाली चीजें: कुछ मान्यताओं के अनुसार इस दिन चंद्रमा को देखना अशुभ माना गया है। साथ ही, पूजा के समय काले या नीले रंग के वस्त्र पहनने से भी बचना चाहिए।

यह पर्व हमें सिखाता है कि अन्न, पशु और पर्यावरण के बिना मानव जीवन अधूरा है। जब हम ईश्वर और प्रकृति का सम्मान करते हैं, तभी जीवन में सुख-समृद्धि और धन-अन्न की कमी नहीं होती।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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