
CG Kharif Season Fertilizer Shortage: छत्तीसगढ़ में खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही खेतों में हलचल तेज हो गई है, लेकिन रासायनिक खाद की भारी किल्लत ने छोटे और मझोले किसानों की चिंता बढ़ा दी है। राज्य में कृषि कार्य के लिए दशकों से चली आ रही पारंपरिक रेघहा (किराए या बटाई पर खेत लेकर खेती करना) व्यवस्था इस बार बड़े संकट में नजर आ रही है। सहकारी समितियों में मांग के अनुरूप खाद की आपूर्ति न होने और कड़े सरकारी नियमों के कारण इस बार रेघ पर खेत लेकर फसल उगाने वाले किसानों ने खेती से अपने हाथ पीछे खींचना शुरू कर दिया है। लागत बढ़ने और फसलों में भारी नुकसान की आशंका के चलते ग्रामीण अंचलों में कृषि अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर दिखने लगा है।
खरीफ की तैयारियों के बीच रासायनिक खाद की किल्लत, पारंपरिक कृषि व्यवस्था पर मंडराया संकट
छत्तीसगढ़ में हर साल एक बड़ा किसान वर्ग संपन्न और बड़े भूस्वामियों से रेघ पर जमीन लेकर धान की बुवाई करता है। इस बार सीजन की शुरुआत में ही डीएपी और यूरिया जैसी जरूरी खादों की भारी कमी हो गई है। सहकारी समितियों से पर्याप्त मात्रा में खाद नहीं मिलने के कारण किसानों को खुले बाजार का रुख करना पड़ रहा है। निजी दुकानों में बढ़ती कीमतों और खाद की जमाखोरी की वजह से खेती की शुरुआती लागत दोगुनी होने की उम्मीद है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर किसानों के लिए इस साल रेघ पर खेत लेकर खेती का जोखिम उठाना नामुमकिन साबित हो रहा है।
रायपुर जिले के मोहदी और लालपुर गांव में सन्नाटा, किसानों ने रेघ पर खेत लेने से किया किनारा
खाद संकट का सबसे ज्यादा असर रायपुर जिले के मैदानी इलाकों में देखने को मिल रहा है। ग्राम मोहदी के किसान राम साह पिछले कई वर्षों से लगातार दो से चार एकड़ खेत रेघ पर लेकर धान की फसल लेते आ रहे हैं, लेकिन इस बार खाद की अनुपलब्धता को देखते हुए उन्होंने एक भी एकड़ खेत किराए पर नहीं लिया है। इसी गांव के अन्य किसान बवन कुमार और राजकुमार भी इसी ऊहापोह में हैं। वहीं, लालपुर गांव के रूपनारायण यादव का कहना है कि खाद न मिलने की वजह से निजी दुकानों में ब्लैक मार्केटिंग शुरू हो गई है, जिससे खेती घाटे का सौदा बन चुकी है।
सरकारी समितियों के चक्कर काट रहे अन्नदाता, समय पर खाद न मिलने से बुवाई पिछड़ने का डर
ग्राम बरबंदा के किसान सतीश वर्मा जैसे सैकड़ों काश्तकार रोज सुबह से समितियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि धान की बुवाई और शुरुआती कल्ले फूटने के समय अगर खेतों में सही मात्रा में डीएपी और यूरिया नहीं डाला गया, तो पैदावार आधी रह जाएगी। मानसून के आगमन के साथ ही खेतों में काम शुरू होना है, लेकिन खाद की अनिश्चितता के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के किसान अब तक यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे इस बार खेतों में उतरें या मजदूरी की तलाश में शहरों की ओर रुख करें।
डिजिटल पंजीयन की अनिवार्यता बनी नई बाधा, मूल खाताधारकों को ही मिलेगी खाद की तय मात्रा
इस साल शासन द्वारा लागू की गई डिजिटल पंजीयन की व्यवस्था ने रेघहा किसानों की मुसीबतों को और बढ़ा दिया है। नए नियमों के मुताबिक, जिस व्यक्ति के नाम पर जमीन का सरकारी भू-अभिलेख और पंजीयन है, केवल उसी के खाते में निर्धारित मात्रा के अनुसार रासायनिक खाद ट्रांसफर की जाएगी। इस फरमान की वजह से रेघ पर खेती करने वाले वास्तविक किसानों को सहकारी समितियों से सीधे खाद नहीं मिल पा रही है। अब वे जमीन मालिकों से अपने मूल खाते के आधार पर खाद दिलाने की मिन्नतें कर रहे हैं, लेकिन वहां भी नियमों की सख्ती के कारण पूरी खाद मिलना संभव नहीं है।
पूर्व के वर्षों की बचत वाली अतिरिक्त खेती का दौर खत्म, समितियों के नए कोटे से किसान परेशान
पिछले सालों तक प्रदेश में खाद की आपूर्ति इतनी सुचारू थी कि किसान अपने मूल कोटे से बची हुई खाद का उपयोग रेघ के खेतों में आसानी से कर लेते थे। कई छोटे किसान खुद की कम जमीन होने के कारण दूसरों के खेत लेकर अपनी आय बढ़ाने के लिए अतिरिक्त खेती किया करते थे, लेकिन इस बार सहकारी समितियों में स्टॉक की भारी कमी है। प्रशासन द्वारा तय किए गए कड़े कोटे के कारण अब किसानों के पास खुद के खेतों के लिए भी पर्याप्त खाद नहीं बच रही है, जिससे अतिरिक्त रकबे पर धान लगाना पूरी तरह बंद हो गया है।
डीएपी और यूरिया के कोटे में भारी कटौती, शासन के नए आदेश से निजी दुकानों पर बढ़ी निर्भरता
नए आदेश के तहत प्रति एकड़ मिलने वाले खाद की लिमिट में बड़ी कटौती कर दी गई है। अब किसानों को डीएपी दो बोरी के स्थान पर केवल एक बोरी (50 किलो) ही दी जाएगी। इसी तरह यूरिया भी तीन बोरी की जगह सिर्फ एक बोरी (45 किलो) ही मिल सकेगी। बीते साल तक असीमित मिलने वाला सुपर फॉस्फेट भी अब प्रति एकड़ केवल एक बोरी तक सीमित कर दिया गया है। इसके साथ ही पोटाश की सीमा भी एक बोरी तय की गई है। इस बार समितियों में 70 प्रतिशत नकद और 30 प्रतिशत खाद-बीज की नई लिमिट तय होने से भी छोटे किसानों की वित्तीय गणित पूरी तरह बिगड़ गई है।
खुले बाजार में शुरू हुई कालाबाजारी, असमंजस की स्थिति में फंसे प्रदेश के हजारों बटाईदार
यदि भूस्वामी अपने कोटे की खाद रेघहा किसानों को दे भी देते हैं, तब भी खेती की जरूरतें पूरी करने के लिए इन किसानों को निजी डीलरों के पास जाना ही पड़ेगा। खुले बाजार में मांग बढ़ने का फायदा उठाकर दुकानदारों ने खादों के दाम बढ़ा दिए हैं। इस दोहरी मार की वजह से छत्तीसगढ़ का पारंपरिक रेघहा किसान असमंजस की स्थिति में फंस गया है। किसानों का मानना है कि यदि शासन ने खाद वितरण के नियमों में तुरंत ढील नहीं दी और समितियों में डीएपी-यूरिया का अतिरिक्त स्टॉक नहीं भेजा, तो इस खरीफ सीजन में राज्य का कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।



