
Indian Rupee Depreciation US Dollar: अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की कीमत में लगातार आ रही ऐतिहासिक गिरावट ने देश के आर्थिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। वर्तमान वित्तीय आंकड़ों के अनुसार रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर अब तक के सबसे निचले स्तर यानी करीब 96 रुपए के आंकड़े को छू रहा है। इस गिरावट के बाद भारतीय करेंसी को एशियाई बाजारों में इस समय सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में गिना जाने लगा है। देश की मजबूत विकास दर के दावों के बीच रुपए का इस कदर टूटना आम जनता की जेब से लेकर आयात होने वाले सामानों की कीमतों को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है।
मोदी सरकार के तीन कार्यकालों में 62.33% गिरा रुपया, दो साल में आई 14 प्रतिशत से अधिक की कमजोरी
साल 2014 से लेकर अब तक के सफर को देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले तीन कार्यकालों के दौरान भारतीय मुद्रा के मूल्य में बड़े पैमाने पर कमी दर्ज की गई है। जब मई 2014 में एनडीए सरकार ने सत्ता संभाली थी तब एक अमेरिकी डॉलर की कीमत महज 58.94 रुपए हुआ करती थी। इसके बाद साल 2019 में दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के समय यह दर 69.37 रुपए पर पहुंच गई। जून 2024 में तीसरे कार्यकाल के शपथ ग्रहण के वक्त रुपया 83.38 के स्तर पर था, जो कि पिछले दो वर्षों के भीतर 14.75 प्रतिशत और टूटकर 96 के करीब पहुंच चुका है। कुल मिलाकर पिछले 12 वर्षों के भीतर रुपए के मूल्य में 62.33 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
मनमोहन सरकार के 10 वर्षों में भी 31 फीसदी से ज्यादा टूटी थी मुद्रा, हर दौर में जारी रहा है उतार-चढ़ाव
मुद्रा के अवमूल्यन का यह सिलसिला केवल वर्तमान सरकार तक ही सीमित नहीं है बल्कि इससे पहले की सरकारों में भी रुपए के कमजोर होने का यह रुख लगातार बना हुआ था। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले यूपीए शासनकाल के 10 वर्षों (2004 से 2014) पर नजर डालें तो उस दौरान भी रुपए में 31.65 प्रतिशत की कुल गिरावट देखी गई थी। साल 2004 में जब मनमोहन सिंह ने कमान संभाली थी तब प्रति डॉलर एक्सचेंज रेट 45.31 रुपए था, जो उनके कार्यकाल की समाप्ति यानी साल 2014 तक आते-आते करीब 60 रुपए के स्तर को पार कर गया था। इससे साफ है कि वैश्विक आर्थिक दबावों का असर हर दौर में भारतीय करेंसी पर पड़ता रहा है।
तेज आर्थिक विकास के बावजूद क्यों गिर रहा है रुपया, नीति विश्लेषकों ने खड़े किए गंभीर सवाल
आमतौर पर आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था अपने पड़ोसी और प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले ज्यादा तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही हो तो उसकी घरेलू मुद्रा को मजबूती मिलनी चाहिए। भारत इस समय दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन इसके बावजूद रुपए का लगातार कमजोर होना अर्थशास्त्रियों को हैरान कर रहा है। कभी सरकार की आर्थिक नीतियों के बड़े पैरोकार रहे जाने-माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने भी इस विरोधाभास पर गंभीर चिंता जताई है। विशेषज्ञ अब यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर देश की जीडीपी और विकास दर के आंकड़े इतने मजबूत हैं, तो विदेशी मुद्रा बाजार में रुपए की साख लगातार क्यों घट रही है।



