छुट्टी के दिन खुला हाई कोर्ट: RTE दाखिले में देरी पर चीफ जस्टिस नाराज, शिक्षा विभाग को लगाई फटकार

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शनिवार को अवकाश होने के बावजूद विशेष सुनवाई करते हुए शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत हो रहे दाखिलों में बरती जा रही लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है। प्रदेश के निजी स्कूलों में गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के प्रवेश की धीमी रफ्तार को देखते हुए चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया। कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के ढीले-ढाले रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए अधिकारियों से जवाब तलब किया है। अवकाश के दिन कोर्ट खुलना इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका बच्चों के भविष्य और उनके शिक्षा के अधिकार को लेकर कितनी गंभीर है।

गरीब बच्चों के हक में खुला कोर्ट: चीफ जस्टिस ने छुट्टी के दिन की सुनवाई

आमतौर पर शनिवार को हाई कोर्ट में कामकाज बंद रहता है, लेकिन गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के हितों की रक्षा के लिए चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने विशेष रूप से कोर्ट लगवाया। अदालत ने मीडिया में प्रकाशित उन खबरों को आधार बनाया जिनमें बताया गया था कि नया शिक्षा सत्र 1 अप्रैल से शुरू हो चुका है, लेकिन आरटीई के तहत एडमिशन की प्रक्रिया अब तक अधूरी है। कोर्ट ने इस सुस्ती को गंभीर मानते हुए शिक्षा विभाग को विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करने का आदेश दिया है।

आंकड़ों में लापरवाही का सच: 16 हजार से ज्यादा आवेदन अब भी लंबित

प्रदेश में आरटीई के तहत पहली कक्षा में प्रवेश के लिए कुल 38,438 आवेदन जमा हुए थे। चौंकाने वाली बात यह है कि निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद भी अब तक केवल 23,766 (करीब 62%) आवेदनों की ही जांच पूरी हो पाई है। अभी भी 16 हजार से अधिक आवेदन नोडल अधिकारियों के पास लंबित पड़े हैं। कई जिलों में तो जांच की रफ्तार इतनी सुस्त है कि वहां अब तक 10 प्रतिशत काम भी पूरा नहीं हुआ है। शिक्षा विभाग ने वेरिफिकेशन के लिए 31 मार्च तक की डेडलाइन तय की थी, जो अब खत्म हो चुकी है।

नोडल प्राचार्यों की सुस्ती से संकट: दांव पर लगा हजारों बच्चों का भविष्य

दाखिले की इस पूरी प्रक्रिया में देरी की मुख्य वजह नोडल प्राचार्यों के स्तर पर होने वाली धीमी जांच को माना जा रहा है। वेरिफिकेशन का काम समय पर पूरा न होने के कारण आगे का शेड्यूल भी बिगड़ता दिख रहा है। तय कार्यक्रम के अनुसार 13 से 17 अप्रैल के बीच लॉटरी के जरिए स्कूलों का आवंटन किया जाना है। अगर जांच इसी तरह अधूरी रही, तो लॉटरी की तारीख बढ़ानी पड़ सकती है। इस लेटलतीफी के कारण उन अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है जो अपने बच्चों के दाखिले के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

लॉटरी सिस्टम पर भी खतरा: समय पर तैयारी न होने से भटकेंगे अभिभावक

नियम के मुताबिक, नोडल वेरिफिकेशन के तुरंत बाद पारदर्शी तरीके से लॉटरी निकाली जाती है ताकि बच्चों को उनके घर के नजदीकी स्कूलों में सीट मिल सके। यदि शिक्षा विभाग अपनी तैयारियों को समय पर पूरा नहीं कर पाता, तो पूरा एडमिशन शेड्यूल पटरी से उतर जाएगा। कोर्ट ने विभाग को चेताया है कि उनकी संवेदनहीनता के कारण गरीब और शोषित वर्ग के बच्चों का शैक्षणिक सत्र खराब नहीं होना चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई अब 8 अप्रैल को होगी, जिसमें विभाग को अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश करनी होगी।

जवाबदेही तय करने के निर्देश: शिक्षा विभाग से मांगा गया विस्तृत शपथ पत्र

हाई कोर्ट की बेंच ने स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे इस सुस्ती के पीछे के कारणों को स्पष्ट करें। कोर्ट ने पूछा है कि जब डेडलाइन तय थी, तो अब तक वेरिफिकेशन का काम पूरा क्यों नहीं हुआ? अदालत ने स्पष्ट किया है कि भविष्य की पीढ़ी के साथ इस तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विभाग को अब 8 अप्रैल तक यह बताना होगा कि लंबित 16 हजार आवेदनों की जांच कब तक पूरी होगी और लॉटरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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