छत्तीसगढ़ में RTE के तहत दाखिले में बड़ी चूक: 6352 सीटें रह गईं खाली, निजी स्कूलों में पढ़ने का सपना टूटा

छत्तीसगढ़ में शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून की जमीनी हकीकत काफी चिंताजनक नजर आ रही है। सत्र 2025-26 के ताजा आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के निजी स्कूलों में आरक्षित 6352 सीटें खाली रह गई हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि हजारों जरूरतमंद और गरीब बच्चे निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा पाने के अवसर से वंचित रह गए। सूचना के अधिकार (RTI) से मिली इस जानकारी ने विभाग की कार्यप्रणाली और जागरूकता अभियानों की पोल खोल दी है। प्रदेश के 33 जिलों में से केवल राजनांदगांव और खैरागढ़-छुईखदान ही ऐसे जिले रहे जहां शत-प्रतिशत सीटें भरी जा सकीं।

प्रमुख शहरों और आदिवासी अंचलों की रिपोर्ट कार्ड

हैरानी की बात यह है कि रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग जैसे बड़े शिक्षा केंद्रों में भी सैकड़ों सीटें खाली हैं। केवल मैदानी इलाके ही नहीं, बल्कि बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में भी स्थिति गंभीर है। बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर जैसे जिलों में या तो पर्याप्त आवेदन नहीं मिले या फिर दस्तावेजों की जांच (स्क्रूटनी) के दौरान बड़ी संख्या में बच्चों को बाहर कर दिया गया।

जिलेवार खाली सीटों का विवरण:

जिलाकुल आरक्षित सीटेंहुए दाखिलेखाली सीटें
रायपुर51984687511
बिलासपुर52034611592
दुर्ग42673517750
जांजगीर-चांपा45214074447
सूरजपुर24181834584
रायगढ़21451839306
सरगुजा16031330273
बस्तर877671206
बीजापुर331203128

प्रशासनिक लापरवाही और नियमों का उलझाव

इतनी बड़ी संख्या में सीटों का खाली रहना सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है। एसोसिएशन ऑफ सोशल एंड आरटीआई एक्टिविस्ट के अध्यक्ष संजय थुल ने सरकार को पत्र लिखकर इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। जानकारों का मानना है कि आवेदन प्रक्रिया शुरू करने में देरी, ऑनलाइन पोर्टल की तकनीकी खामियां और ग्रामीण क्षेत्रों में जानकारी का अभाव इस समस्या की मुख्य वजहें हैं। इसके अलावा लॉटरी प्रक्रिया और स्कूलों द्वारा सत्यापन के दौरान बरती जाने वाली सख्ती भी गरीब परिवारों के लिए रुकावट बनी हुई है।

सर्वे सूची और पात्रता पर उठे सवाल

प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने आरटीई के नियमों में बड़े बदलाव की वकालत की है। उनका कहना है कि वर्तमान में दाखिले के लिए साल 2011 की सर्वे सूची को आधार माना जा रहा है, जो काफी पुरानी हो चुकी है। वास्तविक गरीबों की पहचान के लिए वर्तमान समय के आर्थिक मापदंडों को अपनाना जरूरी है। स्कूलों का यह भी कहना है कि यदि सरकार पात्रता के नियमों को सरल बनाए और वेरिफिकेशन की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाए, तो खाली सीटों को आसानी से भरा जा सकता है।

सरकार की जवाबदेही और सुधार की मांग

शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि खाली पड़ी सीटों को भरने के लिए प्रवेश का एक और विशेष चरण (Special Round) चलाया जाना चाहिए। आदिवासी अंचलों में जहां आवेदन कम आए हैं, वहां मैदानी अमले को घर-घर जाकर सर्वे करना चाहिए। आरटीई कानून का मुख्य उद्देश्य समाज के सबसे निचले तबके के बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना है, लेकिन अगर सीटें ही खाली रह जाएंगी, तो इस कानून का उद्देश्य सफल नहीं हो पाएगा।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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