
Anganwadi Centers Closed: छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो सरकार के महिला एवं बाल विकास के दावों पर सवालिया निशान लगाती है। यह विडंबना ही है कि प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के अपने विधानसभा क्षेत्र भटगांव में ही आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति दयनीय है। मीडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि दूरदराज के गांवों में संचालित केंद्र बच्चों और महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि केवल कागजों पर चल रहे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि ये केंद्र महीने में बमुश्किल दो से चार दिन ही खुलते हैं।

सूरजपुर के कर्री गांव में सामने आई बदहाली
सरकारी योजनाओं का सच जानने के लिए जब टीम जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर ओड़गी विकासखंड के कर्री गांव पहुंची, तो वहां का नजारा चौंकाने वाला था। गांव के पटेलपारा और मझारीपारा में स्थित दो आंगनबाड़ी केंद्रों में ताले लटके मिले। स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां केंद्रों का खुलना किसी इत्तेफाक से कम नहीं है। जिस वक्त बच्चों को पोषण और शिक्षा मिलनी चाहिए, उस वक्त केंद्रों पर सन्नाटा पसरा रहता है। मंत्री का निर्वाचन क्षेत्र होने के बावजूद ऐसी लापरवाही प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करती है।
बच्चों की शिक्षा और पोषण पर पड़ रहा बुरा असर
आंगनबाड़ी केंद्रों के नियमित रूप से बंद रहने का सीधा खामियाजा गांव के छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। ग्रामीणों की शिकायत है कि जब कभी केंद्र खुलते भी हैं, तो वहां न तो बच्चों को पढ़ाया जाता है और न ही कोई खेलकूद की गतिविधियां होती हैं। इससे नौनिहालों की बुनियादी शिक्षा की नींव कमजोर हो रही है। साथ ही, बच्चों और माताओं को मिलने वाला गर्म भोजन और सूखा राशन भी उन तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे क्षेत्र में कुपोषण बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
ग्रामीणों में बढ़ता आक्रोश और निराशा
कर्री गांव के निवासियों में इस अव्यवस्था को लेकर गहरा गुस्सा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे कई बार इसकी शिकायत कर चुके हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। उन्हें उम्मीद थी कि मंत्री का क्षेत्र होने के कारण उनके बच्चों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी, लेकिन यहां तो केंद्रों का ताला तक नहीं खुलता। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि यहां तैनात कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए ताकि शासन की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके।
सरपंच ने अधिकारियों को घेरा, कार्रवाई की मांग
ग्राम पंचायत कर्री के सरपंच राम सिंह मरकाम ने इस स्थिति पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि आंगनबाड़ी केंद्रों का बंद रहना बच्चों और महिलाओं के अधिकारों का हनन है। सरपंच ने स्पष्ट किया है कि वे इस मामले को लेकर उच्च अधिकारियों के पास जाएंगे और लिखित शिकायत दर्ज कराएंगे। उनका कहना है कि सरकारी पैसे का दुरुपयोग और बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दोषी कर्मचारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की जा रही है।
विभाग की सफाई: गर्मी के कारण समय में हुआ बदलाव
पूरे मामले में जब महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी शुभम बंसल से बात की गई, तो उन्होंने बचाव करते हुए समय का तर्क दिया। अधिकारी के अनुसार, 1 अप्रैल से बढ़ती गर्मी को देखते हुए केंद्रों के संचालन का समय सुबह 7 बजे से 11 बजे तक तय किया गया है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि यदि केंद्र कई-कई दिनों तक बंद रहते हैं, तो यह गंभीर मामला है। विभाग ने भरोसा दिलाया है कि मामले की जांच के लिए एक टीम भेजी जाएगी और लापरवाही मिलने पर संबंधित कर्मियों पर कार्रवाई होगी।
कागजों पर सिमटती योजनाएं और हकीकत की खाई
यह घटना दर्शाती है कि राजधानी से निकलने वाले आदेश और योजनाएं जमीनी स्तर पर पहुंचते-पहुंचते कैसे दम तोड़ देती हैं। जब जिम्मेदार विभाग की मंत्री के ही क्षेत्र में अधिकारी और कर्मचारी इतने बेखौफ हैं, तो प्रदेश के बाकी हिस्सों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यह केवल एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि उन तमाम वनांचल क्षेत्रों की स्थिति है जहां मॉनिटरिंग के अभाव में सरकारी व्यवस्था दम तोड़ रही है। बच्चों के हिस्से का पोषण आखिर कहां जा रहा है, यह एक बड़ा प्रश्न है।
जवाबदेही तय करने का समय
सूरजपुर की इस ग्राउंड रिपोर्ट ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या केवल जांच के भरोसे बच्चों का भविष्य सुधर पाएगा? प्रशासन को यह समझना होगा कि आंगनबाड़ी केंद्र केवल इमारतें नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास की पहली सीढ़ी हैं। अब समय आ गया है कि ऊपरी अधिकारियों के साथ-साथ उन पर्यवेक्षकों की भी जवाबदेही तय की जाए जिनके कंधों पर इन केंद्रों के निरीक्षण की जिम्मेदारी है। जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं है, उसे धरातल पर बदलाव चाहिए।



