
देश के भविष्य कहे जाने वाले बच्चों का एक बड़ा हिस्सा आज भी शिक्षा और खेलकूद के बजाय सड़कों पर हाथ फैलाने को मजबूर है। संसद में पेश की गई केंद्र सरकार की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पूरे देश में 14 वर्ष तक की आयु के करीब 45,296 बच्चे भीख मांगते हुए पाए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में आधिकारिक तौर पर 1,065 बच्चे इस दलदल में फंसे हुए हैं। हालांकि जानकारों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि कई घुमंतू परिवार अपने बच्चों के साथ प्रमुख चौराहों और धार्मिक स्थलों पर आसानी से देखे जा सकते हैं।
छत्तीसगढ़ की जमीनी हकीकत: सरकारी आंकड़ों से कहीं बड़ा हो सकता है यह संकट
रायपुर सहित प्रदेश के तमाम छोटे-बड़े शहरों में बच्चों का सड़कों पर घूमना एक आम नजारा बन चुका है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा उपलब्ध कराए गए ये आंकड़े राज्यसभा में रखे गए हैं। छत्तीसगढ़ में भले ही एक हजार बच्चों की पुष्टि हुई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों और उपनगरीय इलाकों में स्थिति और भी गंभीर है। कई बार पूरा परिवार ही इस काम में लगा होता है, जिससे बच्चों के लिए स्कूल जाना एक सपना बनकर रह जाता है। केंद्र सरकार की यह रिपोर्ट उन बच्चों पर आधारित है जो सीधे तौर पर सड़क किनारे भीख मांगते मिले हैं।
पुनर्वास की धीमी रफ्तार: देशभर में केवल 2,653 बच्चों को मिल सकी नई दिशा
आंकड़ों का सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि देशभर में मिले हजारों बच्चों में से केवल 2,653 का ही अब तक प्रभावी रूप से पुनर्वास किया जा सका है। इसका मतलब है कि एक बड़ी आबादी अब भी उसी माहौल में रहने को मजबूर है। सरकारी प्रयासों के तहत करीब 1,507 बच्चों को उनके माता-पिता या परिजनों को सौंपा गया है। वहीं 305 बच्चों के बेहतर पालन-पोषण की जिम्मेदारी आंगनबाड़ी केंद्रों को दी गई है। बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने की प्रक्रिया अभी भी काफी जटिल और धीमी बनी हुई है।
बाल कल्याण समितियों की भूमिका: रहने और पढ़ने के लिए 206 बच्चों को मिला आसरा
रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि करीब 206 बच्चों को बाल कल्याण समितियों (CWC) के हवाले किया गया है। इन समितियों के पास अपने आवासीय भवन होते हैं, जहां बच्चों को सुरक्षित रहने के साथ-साथ शिक्षा की बुनियादी सुविधाएं भी दी जाती हैं। इसके अलावा, 635 बच्चों को औपचारिक स्कूलों से जोड़ने का प्रयास किया गया है ताकि वे शिक्षा के जरिए अपना भविष्य सुधार सकें। हालांकि, संसाधनों की कमी और बच्चों के परिवारों का सहयोग न मिलना इस काम में बड़ी बाधा साबित हो रहा है।
उत्तर प्रदेश सबसे आगे: राज्यों के हिसाब से भिखारी बच्चों की स्थिति
देशभर में भीख मांगने वाले बच्चों के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है, जहां 10,167 बच्चे इस काम में लगे हैं। इसके बाद राजस्थान (7,167) और बिहार (3,396) का नंबर आता है। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में भी यह आंकड़ा तीन हजार के आसपास बना हुआ है। वहीं दूसरी ओर, सिक्किम और लक्षद्वीप जैसे क्षेत्रों में केवल एक-एक बच्चा भीख मांगते मिला। अंडमान निकोबार और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया है।
केंद्रीय क्षेत्रीय योजना: भीख मांगने वाले वयस्कों और बच्चों के लिए बनेगा नया कानून
केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि वह अब भीख मांगने की प्रथा को खत्म करने के लिए एक ‘केंद्रीय क्षेत्रीय योजना’ (Central Sector Scheme) लागू करने जा रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य भीख मांगने वाले वयस्कों के साथ-साथ बच्चों का बड़े पैमाने पर पुनर्वास करना है। इसके तहत कौशल विकास, काउंसलिंग और आर्थिक सहायता जैसे प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं। माना जा रहा है कि इस नई पहल से उन घुमंतू परिवारों को समाज की मुख्यधारा में लाने में मदद मिलेगी जो पीढ़ियों से इसी काम में लगे हैं।
भविष्य की चुनौती: योजनाओं के बावजूद क्यों नहीं कम हो रहे आंकड़े?
सवाल यह उठता है कि तमाम कल्याणकारी योजनाओं और सख्त कानूनों के बावजूद सड़कों पर बच्चों की संख्या कम क्यों नहीं हो रही है। छत्तीसगढ़ में ही घुमंतू बच्चों के पुनर्वास के लिए कई राज्य स्तरीय अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन निगरानी और फॉलो-अप की कमी के कारण नतीजे संतोषजनक नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक गरीबी और अशिक्षा जैसे बुनियादी कारणों पर प्रहार नहीं होगा, तब तक ‘बचपन’ को सड़कों से बचाना मुश्किल होगा। आने वाले समय में सरकारी सख्ती और सामाजिक चेतना ही इस समस्या का समाधान बन सकती है।
Also Read: मक्के की आड़ में गांजे का ‘गोरखधंधा’: कोंडागांव पुलिस ने लहलहाती फसल पकड़ी, दो किसान चढ़े हत्थे



