
छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित ‘रामावतार जग्गी मर्डर केस’ में बिलासपुर हाईकोर्ट के फैसले ने सूबे की सियासत में भूचाल ला दिया है। अदालत ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को हत्या और साजिश रचने का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। करीब 23 साल पुराने इस मामले में आए ऐतिहासिक निर्णय के बाद पीड़ित परिवार ने राहत की सांस ली है। रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने इसे सच्चाई की जीत बताया है। हालांकि, उन्होंने अमित जोगी के लिए फांसी की सजा की मांग करते हुए कहा कि वे कानून की ऊपरी अदालतों में अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।
23 साल का लंबा इंतजार: सतीश जग्गी बोले- रसूख और पैसे के खिलाफ मिली जीत
हाईकोर्ट के फैसले के बाद सतीश जग्गी भावुक नजर आए। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनके परिवार ने पिछले दो दशकों से अधिक समय तक अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। सतीश के मुताबिक यह संघर्ष केवल कानूनी नहीं था, बल्कि एक तरफ राजनीतिक रसूख और अकूत दौलत थी, तो दूसरी तरफ एक बेटे का अपने पिता को न्याय दिलाने का संकल्प। उन्होंने मांग की है कि अमित जोगी का पासपोर्ट तुरंत जब्त किया जाए ताकि वे देश छोड़कर न भाग सकें। सतीश ने स्पष्ट किया कि वे इस उम्रकैद को फांसी की सजा में बदलवाने के लिए फिर से अपील करेंगे।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: मुख्य साजिशकर्ता को बरी करना न्यायिक दृष्टि से गलत
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के 2007 के उस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें अमित जोगी को बरी किया गया था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि जब एक ही गवाही और साक्ष्यों के आधार पर अन्य 28 आरोपियों को दोषी ठहराया जा चुका है, तो मुख्य साजिशकर्ता को छोड़ देना कानूनन असंगत है। इसी आधार पर अदालत ने अमित जोगी को आईपीसी की धारा 302 और 120-बी के तहत उम्रकैद और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।
क्या थी 4 जून 2003 की वारदात: रायपुर में सरेराह हुई थी एनसीपी नेता की हत्या
रामावतार जग्गी हत्याकांड छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे वीभत्स राजनीतिक अपराधों में गिना जाता है। 4 जून 2003 को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के प्रदेश कोषाध्यक्ष रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय प्रदेश की राजनीति में जग्गी एक बड़ा नाम थे और वे पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी माने जाते थे। शुक्ल के कांग्रेस छोड़ने के बाद जग्गी ने भी एनसीपी का दामन थाम लिया था, जिसके बाद उनकी हत्या ने तत्कालीन जोगी सरकार की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।
सरकारी गवाहों ने खोली पोल: 31 आरोपियों में से 28 को पहले ही मिली थी सजा
इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच के दौरान कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें से बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह सरकारी गवाह बन गए थे, जिनकी गवाही ने हत्या की पूरी साजिश का पर्दाफाश किया। साल 2007 में रायपुर की विशेष अदालत ने 28 आरोपियों को तो दोषी करार दिया था, लेकिन अमित जोगी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था। सतीश जग्गी ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद मामला दोबारा हाईकोर्ट पहुंचा और अब जाकर अंतिम निर्णय आया है।
कौन थे रामावतार जग्गी: राजनीति और व्यापार का एक प्रभावशाली चेहरा
जग्गी हत्याकांड के केंद्र में रहे रामावतार जग्गी एक सफल कारोबारी होने के साथ-साथ कद्दावर नेता भी थे। विद्याचरण शुक्ल के ‘दाहिने हाथ’ कहे जाने वाले जग्गी ने छत्तीसगढ़ में एनसीपी के संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी। उनकी हत्या ने न केवल एक परिवार को तोड़ा बल्कि प्रदेश की चुनावी राजनीति की दिशा भी बदल दी थी। उनकी मौत के बाद से ही जोगी परिवार पर राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने के आरोप लगते रहे हैं, जिसे अब कोर्ट के फैसले ने एक नई मजबूती दी है।
दोषियों की लंबी फेहरिस्त: याह्या ढेबर और फिरोज सिद्दीकी समेत कई नाम शामिल
इस मर्डर केस में दोषी पाए गए लोगों में कई प्रभावशाली नाम शामिल हैं। अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, और चिमन सिंह जैसे 28 लोगों को पहले ही सजा सुनाई जा चुकी है। हाईकोर्ट ने अमित जोगी को भी इसी कतार में खड़ा कर दिया है। कोर्ट के आदेश के मुताबिक, अमित जोगी को अब जल्द ही सरेंडर करना होगा। इस फैसले ने यह साबित कर दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया में समय भले ही लगे, लेकिन साक्ष्यों के आधार पर रसूखदारों को भी सलाखों के पीछे भेजा जा सकता है।
न्याय का नया अध्याय: राजनीतिक हलकों में मची भारी हलचल
बिलासपुर हाईकोर्ट के इस फैसले ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला दिया है। वर्तमान राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अमित जोगी और उनके परिवार को घेरने की तैयारी में हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला न केवल एक हत्या का न्याय है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक नजीर भी है। सतीश जग्गी ने साफ कर दिया है कि वे अमित जोगी को फांसी की सजा दिलाने के लिए उच्चतम न्यायालय तक जाएंगे। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अमित जोगी इस कानूनी शिकंजे से बचने के लिए आगे क्या कदम उठाते हैं।
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