
Iran US Conflict Medicine Price Hike: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का सीधा असर अब आम आदमी की जेब और सेहत पर पड़ने लगा है। वैश्विक उथल-पुथल के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल्स के दाम आसमान छू रहे हैं। इसका सबसे बड़ा खामियाजा फार्मा उद्योग को भुगतना पड़ रहा है। दवाओं को तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले जरूरी साल्वेंट्स और रसायनों की आपूर्ति पूरी तरह प्रभावित हो चुकी है। इस वजह से आने वाले दो महीनों के भीतर आम मरीजों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली रोजमर्रा की जरूरी दवाएं जैसे बुखार, बदन दर्द, डायबिटीज और एंटीबायोटिक दवाओं की कीमतों में 20 से 30 फीसदी तक की भारी बढ़ोतरी होने की आशंका जताई जा रही है।
समुद्री रास्ते बंद होने से कच्चे माल का संकट, फार्मा सॉल्वेंट्स के दामों में आया उछाल
दवा निर्माण से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान और अमेरिका के बीच जारी इस विवाद के कारण प्रमुख समुद्री शिपिंग रूट पूरी तरह ठप या डायवर्ट हो चुके हैं। इस वजह से खाड़ी देशों से आने वाले पेट्रोकेमिकल उत्पादों की आवक रुक गई है। दवा बनाने में काम आने वाले मुख्य फार्मा सॉल्वेंट्स जैसे प्रोपलीन, मेथेनॉल और अमोनिया के दाम वैश्विक स्तर पर काफी बढ़ गए हैं। इन रसायनों की कमी के कारण अब देश की दवा निर्माता कंपनियों को ऊंचे दामों पर रॉ मटेरियल खरीदना पड़ रहा है, जिसका सीधा बोझ बहुत जल्द अंतिम उत्पाद यानी बाजार में मिलने वाली दवाओं पर ट्रांसफर होने जा रहा है।
पैरासिटामॉल से लेकर ग्लूकोज की बोतल तक पर बढ़ेगी कीमत, जानिए कौन सी दवाएं होंगी महंगी
फार्मा कारोबारियों से मिली जानकारी के अनुसार, आने वाले दिनों में हर घर में इस्तेमाल होने वाली पैरासिटामॉल (बुखार), डाइक्लोफेनेक (पेन किलर), मेटफार्मिन (डायबिटीज) और सिप्रोफ्लॉक्सासिन व एजिथ्रोमाइसिन (एंटीबायोटिक) जैसी दवाओं के दाम बढ़ेंगे। इसके अलावा गैस की दवा पेंटाप्रोजॉल और सांस व एलर्जी की दवा मोंटेलुकास्ट सोडियम के पत्तों (स्ट्रिप) की कीमतों में भी उछाल आएगा। वर्तमान में ही अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली ग्लूकोज की बोतलों की थोक कीमतों में 15 से 20 रुपये प्रति बोतल तक की तेजी दर्ज की जा चुकी है, जो आने वाले दिनों में खुदरा बाजार में और महंगी हो जाएगी।
पैकेजिंग मटेरियल भी हुआ 40 फीसदी तक महंगा, कांच की शीशी और रबर स्टॉपर के बदले रेट
दवाइयों के भीतर डलने वाले साल्ट के साथ-साथ उनकी बाहरी पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भी इस संकट की वजह से बेहद महंगा हो गया है। बाजार में पॉलीएलिथीन की कीमत 80 रुपये से बढ़कर 160 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा सिरप और इंजेक्शन के लिए इस्तेमाल होने वाली पीवीसी बोतलें 35 फीसदी, एल्युमिनियम फाइल 30 से 40 फीसदी और कांच की शीशियां (ग्लास वायल) व रबर स्टॉपर की दरें 20 से 30 फीसदी तक बढ़ गई हैं। केमिस्ट एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि पैकेजिंग और इनपुट कॉस्ट बढ़ने से कंपनियों के पास दाम बढ़ाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।
पुराने स्टॉक के भरोसे चल रहा है मौजूदा बाजार, दो महीने बाद जेब पर पड़ेगा सीधा असर
इस पूरे संकट के बीच आम उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल एकमात्र राहत की बात यह है कि खुदरा मेडिकल स्टोर्स में अभी पुरानी कीमतों पर ही दवाइयां बेची जा रही हैं। देश भर के थोक विक्रेताओं और दवा दुकानों के पास करीब दो महीने का पुराना स्टॉक पहले से सुरक्षित मौजूद है, जिस पर पुरानी एमआरपी (MRP) छपी हुई है। इसी वजह से मरीजों को तुरंत बढ़ी हुई कीमतों का भुगतान नहीं करना पड़ रहा है। हालांकि, जैसे ही यह पुराना स्टॉक बाजारों से खत्म होगा और फैक्ट्रियों से नया लॉट बनकर पहुंचेगा, वैसे ही नए प्रिंट रेट के साथ ग्राहकों की जेब हल्की होनी तय है।
जेनेरिक दवाओं पर मुनाफे का बड़ा खेल, रेडक्रॉस और धनवंतरी स्टोर्स के रेट में बड़ा अंतर
दवा बाजार के जानकारों ने इस संकट के बीच जेनेरिक दवाइयों पर होने वाले मुनाफे के खेल को भी उजागर किया है। जेनेरिक दवाओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) में 72 फीसदी तक की भारी छूट देने के बावजूद निजी दुकानदार बड़ा मुनाफा कमा रहे हैं। उदाहरण के लिए, जिस मोंटेलुकास्ट टैबलेट की छपी हुई कीमत 299 रुपये है, वह भारी डिस्काउंट के बाद आम दुकान पर 84 रुपये में मिलती है। यही दवा सरकारी रेडक्रॉस मेडिकल स्टोर में बिना किसी लाभ-हानि के नियम के तहत मात्र 35 रुपये में मिल जाती है। वहीं दूसरी ओर, रियायती दरों का दावा करने वाले कुछ अन्य सरकारी काउंटरों पर केवल ज्यादा मुनाफे वाले ब्रांड्स बेचने के आरोप लग रहे हैं।



