
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर समेत बड़े शहरों की सड़कों पर हर सुबह लाखों मासूमों का सफर किसी जोखिम से कम नहीं होता। टाटीबंध से लेकर भिलाई के पावर हाउस चौक तक, स्कूल बसें और ऑटो अक्सर हादसों का शिकार हो रहे हैं। जहां पड़ोसी राज्य तेलंगाना ने अपने बच्चों को बचाने के लिए लंदन के हाईटेक ट्रांसपोर्ट मॉडल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सहारा लिया है, वहीं छत्तीसगढ़ में आज भी हादसों के बाद केवल औपचारिक जांच का भरोसा दिलाया जाता है। प्रदेश के करीब 38 लाख स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
आंकड़ों में डरावनी हकीकत: 38 लाख बच्चों की सुरक्षा और खटारा बसें
छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग के दस्तावेजों के अनुसार, प्रदेश में 56 हजार से ज्यादा सरकारी और लगभग 6,900 निजी स्कूल संचालित हैं। इन संस्थानों में पढ़ने वाले 38 लाख से अधिक बच्चों में से करीब 70 प्रतिशत छात्र स्कूल आने-जाने के लिए बसों, वैन या ऑटो का इस्तेमाल करते हैं। सरकारी ‘वाहन’ पोर्टल की मानें तो राज्य में शिक्षण संस्थानों की लगभग 7,756 बसें पंजीकृत हैं। चिंता की बात यह है कि परिवहन विभाग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से 25 प्रतिशत बसें फिटनेस और सुरक्षा मानकों (जैसे पैनिक बटन और जीपीएस) पर खरी नहीं उतरतीं।

क्या है तेलंगाना का ‘लंदन मॉडल’: स्मार्ट नेटवर्क से जुड़ेंगी 15 हजार बसें
तेलंगाना के साइबराबाद में पुलिस ने लंदन ट्रांसपोर्ट मॉडल की तर्ज पर एक क्रांतिकारी मास्टर प्लान लागू किया है। इस सिस्टम के तहत 15,000 स्कूल बसों को एक स्मार्ट डिजिटल नेटवर्क से जोड़ा गया है। इस मॉडल में बसों का रूट कोई इंसान नहीं बल्कि एआई (AI) सॉफ्टवेयर तय करता है, जिससे ट्रैफिक जाम में 30 प्रतिशत तक की कमी आती है। साथ ही, माता-पिता अपने मोबाइल ऐप पर रीयल-टाइम देख सकते हैं कि बस कहां है और उसकी रफ्तार कितनी है। यह तकनीक मानवीय चूक की गुंजाइश को लगभग खत्म कर देती है।
हादसों का गढ़ बनता रायपुर-भिलाई: ओवरस्पीडिंग और भारी वाहनों का कहर
बीते एक साल (2025-26) के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 60 प्रतिशत स्कूली वाहन हादसे केवल तेज रफ्तार की वजह से हुए हैं। विशेष रूप से स्कूल की छुट्टी के समय जब भारी वाहनों का दबाव बढ़ता है, तब 15 प्रतिशत हादसे दर्ज किए गए हैं। रायपुर के टाटीबंध जैसे संवेदनशील इलाकों में स्कूली वाहनों की सुरक्षा के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। लंदन मॉडल में ड्राइवर की हर हरकत पर डिजिटल नजर रखी जाती है, जिससे छत्तीसगढ़ की सड़कों पर होने वाली इन मौतों को शून्य पर लाया जा सकता है।
ड्राइवरों की ट्रेनिंग पर सवाल: बिना वेरिफिकेशन के थमा दी जाती है स्टेयरिंग
छत्तीसगढ़ में अक्सर देखा गया है कि स्कूली वाहनों के ड्राइवरों के पास न तो पर्याप्त ट्रेनिंग होती है और न ही उनका सही तरीके से पुलिस वेरिफिकेशन किया जाता है। इसके विपरीत, लंदन और तेलंगाना मॉडल में बिना डिजिटल ऑथेंटिकेशन के कोई भी ड्राइवर बस स्टार्ट नहीं कर सकता। वहां हर ड्राइवर का पिछला रिकॉर्ड और स्वास्थ्य जांच अनिवार्य है। रायपुर की सड़कों पर सुबह 8 बजे और दोपहर 2 बजे के ट्रैफिक दबाव को ‘शेयर्ड बस सर्विस’ के जरिए कम किया जा सकता है, लेकिन यहां इच्छाशक्ति की कमी साफ झलकती है।
बजट की नहीं, इच्छाशक्ति की कमी: स्मार्ट सिटी के करोड़ों खर्च फिर भी बच्चे असुरक्षित
विशेषज्ञों का मानना है कि इस हाईटेक सुरक्षा कवच को लागू करने की लागत एक नई सड़क बनाने के खर्च से भी कम है। जब स्मार्ट सिटी के नाम पर करोड़ों रुपये सौंदर्यीकरण और बुनियादी ढांचे पर खर्च किए जा सकते हैं, तो बच्चों की सुरक्षा के लिए एक एकीकृत कंट्रोल रूम और स्मार्ट ऐप बनाने में देरी क्यों हो रही है? प्रशासन को बस थोड़ी सी इच्छाशक्ति दिखाकर पुलिस और परिवहन विभाग को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाना होगा, ताकि हर मासूम का सफर सुरक्षित हो सके।
बड़े हादसे का इंतजार क्यों: पड़ोसी राज्यों के सफल प्रयोगों से सीखने की जरूरत
सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ का सिस्टम किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? जब तेलंगाना जैसे राज्य अपने बच्चों के लिए विदेशी तकनीक अपनाकर सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं, तो छत्तीसगढ़ में इसे लागू करने में क्या बाधा है? केवल नोटिस जारी करने या चेकिंग अभियान चलाने से समस्या का स्थाई समाधान नहीं होगा। जरूरत है एक ऐसे फुल-प्रूफ सिस्टम की, जिसमें तकनीक और जवाबदेही दोनों शामिल हों। अब समय आ गया है कि कागजी कार्रवाई छोड़कर धरातल पर बच्चों के लिए डिजिटल कवच तैयार किया जाए।



