
छत्तीसगढ़ सरकार ने बस्तर के दूरदराज इलाकों में रहने वाले परिवारों को राहत देने के लिए एक साथ तीन महीने का राशन बांटने का बड़ा एलान किया था। लेकिन जमीनी हकीकत इस वादे से कोसों दूर नजर आ रही है। बस्तर संभाग के करीब 1.75 लाख गरीब परिवार अब एक महीने का कोटा पाने के लिए भी राशन दुकानों के चक्कर काट रहे हैं। सरकारी घोषणाओं और धरातल पर अनाज की उपलब्धता के बीच गहरा अंतर साफ दिख रहा है। हालात यह हैं कि भीषण गर्मी में ग्रामीण मिलों पैदल चलकर दुकान पहुंच रहे हैं और वहां से उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।
गोदाम खाली और दुकानें सूनी: आधे से ज्यादा केंद्रों पर नहीं पहुंचा अनाज
बस्तर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत कुल 485 राशन दुकानें संचालित हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक इनमें से केवल 300 दुकानों में ही आंशिक रूप से अनाज पहुंच पाया है। बाकी की 185 दुकानों में अब तक भंडारण ही शुरू नहीं हुआ है। जब दुकानों में एक महीने का पर्याप्त स्टॉक ही मौजूद नहीं है, तो तीन महीने का राशन एक साथ देना नामुमकिन लग रहा है। उपभोक्ता सुबह से लाइन में लगते हैं लेकिन दोपहर होते-होते उन्हें स्टॉक खत्म होने की बात कहकर वापस भेज दिया जाता है।
विभागों में तालमेल का अभाव: नान और खाद्य विभाग की सुस्ती ने बढ़ाई मुश्किल
इस पूरे संकट के पीछे नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) और खाद्य विभाग के बीच आपसी तालमेल की कमी को जिम्मेदार माना जा रहा है। अनाज के उठाव और परिवहन को लेकर दोनों विभागों के बीच सुस्त प्रक्रिया ने सप्लाई चेन को तोड़ दिया है। खाद्य नियंत्रक का कहना है कि जितना स्टॉक उपलब्ध कराया जा रहा है, उसी के अनुपात में वितरण किया जा रहा है। इस बयान से साफ है कि प्रशासन के पास फिलहाल सरकार के ‘तीन महीने वाले वादे’ को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद नहीं हैं।
सर्वर की समस्या ने बढ़ाई आफत: अंगूठा लगाने के चक्कर में बीत रहे दिन
राशन वितरण में केवल अनाज की कमी ही इकलौती बाधा नहीं है। फरवरी और मार्च के महीने में सर्वर डाउन होने की वजह से ई-पॉस मशीनों ने काम करना बंद कर दिया था। बायोमेट्रिक पहचान न हो पाने के कारण हजारों ग्रामीण अनाज लेने से वंचित रह गए। अब अप्रैल का महीना आधा बीतने को है और पुराने बैकलॉग के कारण वितरण व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। सर्वर की खराबी और स्टॉक की किल्लत ने मिलकर गरीब परिवारों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा कर दिया है।
मई-जून तक खिंच सकती है किल्लत: देरी से वितरण होने का बना डर
जानकारों का मानना है कि अगर भंडारण की रफ्तार यही रही, तो अप्रैल का राशन मिलने में मई या जून तक का समय लग सकता है। बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों में लोग खेती-किसानी और मजदूरी छोड़कर राशन के लिए घंटों इंतजार करते हैं। राशन कार्ड धारी परिवारों का कहना है कि सरकार को बड़ी घोषणाएं करने से पहले बैकअप और स्टॉक की पुख्ता व्यवस्था करनी चाहिए थी। अब ग्रामीण क्षेत्रों में इस अव्यवस्था को लेकर धीरे-धीरे आक्रोश पनपने लगा है।
बिचौलियों की चांदी: कमी के बीच कालाबाजारी की आशंका
जब सरकारी दुकानों पर अनाज नहीं मिलता, तो गरीब परिवारों को मजबूरी में खुले बाजार का रुख करना पड़ता है। इस स्थिति का फायदा उठाकर कुछ बिचौलिए सक्रिय हो गए हैं। स्थानीय लोगों ने शिकायत की है कि राशन दुकानों से अनाज गायब है लेकिन बाजार में ऊंचे दामों पर सरकारी चावल की अवैध बिक्री की खबरें आ रही हैं। प्रशासन की ढिलाई ने न केवल गरीबों की थाली से निवाला छीना है बल्कि भ्रष्टाचार की आशंकाओं को भी जन्म दे दिया है।
प्रशासन का डैमेज कंट्रोल: जल्द सप्लाई बहाल करने का दावा
मामला तूल पकड़ता देख अब प्रशासन ने डैमेज कंट्रोल शुरू कर दिया है। संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि परिवहन की बाधाओं को दूर कर तत्काल दुकानों तक अनाज पहुंचाया जाए। हालांकि, बस्तर की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए बारिश शुरू होने से पहले अंदरूनी इलाकों तक राशन पहुंचाना एक बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल ग्रामीणों की नजरें उन ट्रकों पर टिकी हैं जो उनकी उम्मीद का राशन लेकर आने वाले हैं।



