
CG Tilapia Fish Export Crisis: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब छत्तीसगढ़ के जलाशयों तक पहुंच गया है। प्रदेश के कवर्धा, कांकेर और कोरबा जैसे जिलों से हर साल लाखों टन ‘तिलापिया’ मछली अमेरिका निर्यात की जाती है, लेकिन युद्ध की स्थितियों ने इस व्यापार की कमर तोड़ दी है। वर्तमान में लगभग 20 हजार टन तैयार मछली तालाबों में ही डंप पड़ी है। जानकारों का मानना है कि यदि यह गतिरोध एक-दो महीने और चला, तो स्थानीय मछुआरों और निर्यातकों को 200 करोड़ रुपये से अधिक का बड़ा आर्थिक फटका लग सकता है।
तालाबों में फंसी तिलापिया, विदेशी बाजार में मांग ठप
छत्तीसगढ़ के प्रमुख जलाशयों जैसे कांकेर के दुधावा, कोरबा के बांगो और कवर्धा के सरोदा बांध में तिलापिया मछली का बड़े पैमाने पर पालन होता है। यहां के मछुआरे इसे मुख्य रूप से अमेरिकी बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार करते हैं। आम तौर पर कंपनियां मछुआरों से इसे 105 से 110 रुपये प्रति किलो की दर पर खरीदती हैं, जिसे विशाखापट्नम और कोलकाता बंदरगाह के जरिए अमेरिका भेजा जाता है। फिलहाल समुद्री रास्तों में बढ़ते खतरे और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में देरी की वजह से निर्यात पूरी तरह ठप पड़ा है।
अमेरिका में ‘एक्वाटिक चिकन’ के रूप में मशहूर है यह मछली
तिलापिया मछली की अमेरिका में जबरदस्त मांग है और वहां इसे ‘एक्वाटिक चिकन’ भी कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह वहां के लोगों का खान-पान है। अमेरिका में लोग मछली के टुकड़े करने के बजाय पूरी मछली (होल फिश) खाना पसंद करते हैं। तिलापिया का आकार और स्वाद इस जरूरत के लिए बिल्कुल सटीक बैठता है। छत्तीसगढ़ से आमतौर पर 500 से 800 ग्राम वजन वाली मछलियां भेजी जाती हैं, जो वहां के बाजारों में 250 से 300 रुपये प्रति किलो तक के ऊंचे दामों पर बिकती हैं।
मछली का बढ़ता वजन बना मछुआरों की नई मुसीबत
निर्यात रुकने से मछुआरों के सामने एक अजीब तकनीकी समस्या खड़ी हो गई है। निर्यात के लिए मछली का वजन 800 ग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। 8 महीने पहले डाले गए बीज अब बड़े होकर 500 ग्राम से ऊपर निकल चुके हैं। यदि निर्यात जल्द शुरू नहीं हुआ, तो मछलियां भारी हो जाएंगी और अमेरिकी मानक के अनुसार उन्हें रिजेक्ट कर दिया जाएगा। मछुआरों को डर है कि वजन बढ़ने के बाद विदेशी खरीदार इन्हें नहीं लेंगे और स्थानीय बाजार में इस मछली की मांग बहुत कम है।
चीन पर भारी टैक्स से भारत को मिला था बड़ा मौका
साल 2025 की शुरुआत में जब अमेरिका ने चीन से आने वाले सी-फूड पर इंपोर्ट टैक्स को बढ़ाकर 170 प्रतिशत कर दिया था, तब भारत और विशेषकर छत्तीसगढ़ के मत्स्य पालकों के लिए नए रास्ते खुले थे। इस टैक्स वृद्धि की वजह से भारत से तिलापिया का निर्यात तेजी से बढ़ा था। वर्तमान में अमेरिका में इस मछली की कमी के कारण कीमतें दो से तीन गुना तक बढ़ गई हैं, लेकिन युद्ध के कारण छत्तीसगढ़ के निर्यातक इस मौके का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं।
ठप पड़ा कारोबार और नए उत्पादन पर संशय
मछली पालन से जुड़े स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि पिछले दो महीनों से निर्यात में गिरावट आ रही थी, लेकिन अब यह पूरी तरह बंद हो चुका है। मछुआरे अब इस उलझन में हैं कि तालाबों में नए बीज डालें या नहीं। यदि मौजूदा स्टॉक को लंबे समय तक तालाब में छोड़ा गया, तो ऑक्सीजन की कमी और अधिक घनत्व की वजह से मछलियों के मरने का खतरा भी बढ़ जाएगा। ऐसे में मछुआरे दोहरी मार झेलने को मजबूर हैं।
सरकारी प्रोत्साहन और केज कल्चर को लगा झटका
छत्तीसगढ़ सरकार राज्य में मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए लगातार कदम उठा रही है। संचालनालय मछली पालन के अनुसार, सरकार केज कल्चर के लिए मछुआरों को भारी सब्सिडी दे रही है ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके। तिलापिया के उत्पादन में छत्तीसगढ़ अग्रणी राज्य बनकर उभर रहा था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने इस रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। विभाग अब स्थानीय स्तर पर इस मछली की खपत बढ़ाने के विकल्पों पर विचार कर रहा है ताकि मछुआरों के नुकसान को कम किया जा सके।
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