
मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में जारी तनाव की तपिश अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के किचन तक पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छिड़ी जंग और सप्लाई चैन में आई रुकावटों ने रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों को महंगा कर दिया है। किराने के सामान से लेकर नहाने के साबुन तक, हर चीज की कीमतों में उछाल देखने को मिल रहा है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि वैश्विक हालात के चलते आयात-निर्यात प्रभावित हुआ है, जिसका सीधा खामियाजा अब आम उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ रहा है। आने वाले दिनों में अगर स्थितियां नहीं सुधरीं, तो महंगाई का यह ग्राफ और ऊपर जा सकता है।
दालों के दाम में 15% तक का उछाल: थाली से दूर हो रही प्रोटीन की खुराक
रायपुर के थोक और चिल्हर बाजारों में दालों की कीमतों ने रफ्तार पकड़ ली है। किराना स्टोर संचालकों के मुताबिक पिछले कुछ दिनों के भीतर ही तुअर, मूंग और उड़द जैसी प्रमुख दालों के भाव में 10 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। व्यापारियों का कहना है कि स्टॉक की कमी और परिवहन लागत बढ़ने से कीमतों को नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है। आम आदमी के लिए दाल-चावल जैसा सादा भोजन भी अब महंगा सौदा साबित हो रहा है, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों के मासिक बजट पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है।
तेल की कीमतों में लगी आग: प्रति टिन 300 रुपये तक की भारी बढ़ोतरी
खाने के तेल के बाजार में सबसे ज्यादा उथल-पुथल देखी जा रही है। विदेशों से आयात होने वाले सोयाबीन तेल की सप्लाई बाधित होने से घरेलू बाजार में रिफाइंड और सरसों तेल के दाम आसमान छू रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार तेल के डिब्बे (टिन) पर 75 रुपये से लेकर 300 रुपये तक की तेजी आई है। चूंकि भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरतों के लिए एक बड़े हिस्से का आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर चल रहे तनाव का असर सीधे तौर पर यहां की तेल बोतलों और टिन के लेबल पर दिखने लगा है।
पेट्रोकेमिकल्स का संकट: अब महंगा पड़ेगा कपड़े धोना और नहाना
महंगाई का यह प्रहार सिर्फ खाने-पीने की चीजों तक सीमित नहीं है। वॉशिंग पाउडर, डिटर्जेंट और साबुन जैसी चीजों के दाम भी बढ़ने लगे हैं। इसकी मुख्य वजह पेट्रोकेमिकल्स की कमी है, जो मिडिल ईस्ट देशों से बड़े पैमाने पर आयात किए जाते हैं। इन रसायनों का उपयोग साबुन और प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण में कच्चे माल के तौर पर होता है। कच्चे माल की किल्लत और उसकी ऊंची कीमतों ने कंपनियों को मजबूर कर दिया है कि वे अपने उत्पादों के दाम बढ़ाएं, जिसका अंतिम भार ग्राहकों की जेब पर पड़ रहा है।
प्लास्टिक और पॉलिथीन भी महंगे: पैकेजिंग उद्योग पर पड़ा बुरा असर
पेट्रोकेमिकल्स की आपूर्ति में आई रुकावट का असर प्लास्टिक और पॉलिथीन उद्योग पर भी पड़ा है। घरेलू उपयोग में आने वाले प्लास्टिक के डिब्बे, बाल्टी और पैकेजिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली पॉलिथीन की कीमतें बढ़ गई हैं। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े मैन्युफैक्चरर्स तक इस संकट से परेशान हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक उत्पादों की लागत बढ़ने से उन सभी चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं जिनकी पैकेजिंग में इनका उपयोग होता है। यह एक तरह का ‘डोमिनो इफेक्ट’ है जो धीरे-धीरे हर सेक्टर को अपनी चपेट में ले रहा है।
रुकी हुई सप्लाई चैन: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की किल्लत
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने समुद्री व्यापारिक मार्गों को असुरक्षित बना दिया है। मालवाहक जहाजों के रास्ते बदलने या देरी से पहुंचने के कारण कच्चा माल समय पर भारत नहीं पहुंच पा रहा है। जब सप्लाई कम और मांग ज्यादा होती है, तो बाजार में जमाखोरी और कालाबाजारी की आशंका भी बढ़ जाती है। रायपुर के बड़े थोक विक्रेताओं का कहना है कि वे फिलहाल पुराने स्टॉक से काम चला रहे हैं, लेकिन नया माल ऊंची कीमतों पर मिल रहा है, जिसे पुरानी दरों पर बेचना अब मुमकिन नहीं रह गया है।
उत्पादन लागत में वृद्धि: कंपनियों ने बढ़ाई एमआरपी
जब कच्चे माल की कीमत बढ़ती है, तो फैक्ट्रियों में उत्पादन की लागत खुद-ब-खुद बढ़ जाती है। डिटर्जेंट और साबुन बनाने वाली दिग्गज कंपनियों ने धीरे-धीरे अपने प्रोडक्ट्स की एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) में बदलाव करना शुरू कर दिया है। कुछ कंपनियों ने दाम बढ़ाने के बजाय पैकेट का वजन कम कर दिया है, जिसे ‘श्रिंकफ्लेशन’ कहा जाता है। उपभोक्ता को भले ही पैकेट उसी दाम पर मिल रहा हो, लेकिन उसे मिलने वाली सामग्री की मात्रा कम हो गई है, जो महंगाई का ही एक छिपा हुआ रूप है।
भविष्य की चिंता: क्या और बढ़ेगी महंगाई?
बाजार विशेषज्ञों और व्यापारियों के बीच इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह अनिश्चितता कब तक चलेगी। यदि वैश्विक स्तर पर युद्ध के हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव और ज्यादा बढ़ सकता है। आम जनता अब अपनी बचत में कटौती कर रही है और केवल अनिवार्य वस्तुओं की ही खरीदारी कर रही है। रायपुर के बाजारों में ग्राहकों की चहल-पहल तो है, लेकिन लोग अब खरीदारी करने से पहले कई बार सोच रहे हैं। शासन-प्रशासन के लिए भी कीमतों पर लगाम लगाना इस समय एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।



