
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित खल्लारी माता मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि इतिहास का जीवित प्रमाण है। द्वापर युग से नाता रखने वाला यह पावन धाम ऊंची पहाड़ियों पर स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में जब पांडव 12 वर्ष के वनवास पर थे तब उन्होंने इस स्थान पर समय बिताया था। यहाँ की फिजाओं में आज भी भीम और हिडिम्बनी की प्राचीन गाथाएं गूंजती हैं जो श्रद्धालुओं को एक अलग ही युग का एहसास कराती हैं।

भीम और हिडिम्बनी की भक्ति का संगम
इस स्थान का धार्मिक महत्व हिडिम्ब राक्षस की बहन हिडिम्बनी से भी जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि हिडिम्बनी इसी पहाड़ी पर आकर देवी शक्ति की आराधना किया करती थीं। भीम के साथ उनके जुड़ाव और पांडवों के आगमन की कहानियों ने इस मंदिर को पूरे प्रदेश में विख्यात कर दिया है। आज भी हजारों लोग इन प्राचीन पदचिह्नों और कथाओं को करीब से महसूस करने के लिए खल्लारी की ऊँची चोटी तक का सफर तय करते हैं।
850 सीढ़ियों का सफर अब हुआ आसान
पहाड़ी की चोटी पर स्थित मुख्य मंदिर तक पहुँचने के लिए पहले भक्तों को 850 कठिन सीढ़ियां चढ़नी पड़ती थीं। बुजुर्गों और बच्चों के लिए यह यात्रा काफी चुनौतीपूर्ण होती थी लेकिन अब आधुनिक सुविधाओं ने इस राह को सुगम बना दिया है। मंदिर प्रबंधन ने यहाँ रोप-वे की शुरुआत की है जिससे श्रद्धालु चंद मिनटों में पहाड़ी के शिखर पर पहुँचकर माता के दर्शन कर सकते हैं। हालांकि अपनी मन्नत पूरी होने पर आज भी कई भक्त पैदल चढ़कर ही दरबार तक पहुँचना पसंद करते हैं।

नि:संतान दंपत्तियों की अटूट श्रद्धा का केंद्र
खल्लारी माता के दरबार में साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन यहाँ की एक विशेष मान्यता इसे औरों से अलग बनाती है। प्रचलित जनश्रुति है कि संतान सुख से वंचित जो भी दंपत्ति सच्चे मन से माता के दर्शन करते हैं और मंदिर में मनोकामना ज्योति प्रज्ज्वलित करते हैं उनकी गोद जल्द ही भर जाती है। इसी अटूट विश्वास के चलते छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी लोग यहाँ अपनी अर्जी लेकर पहुँचते हैं।
चैत्र नवरात्रि और पूर्णिमा का विशाल मेला
मंदिर में साल के दोनों नवरात्रों में उत्सव जैसा माहौल रहता है। शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान यहाँ प्रतिदिन 30 से 35 हजार श्रद्धालु मत्था टेकते हैं। 1985 से यहाँ अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित करने की परंपरा शुरू हुई थी जो आज भी जारी है। चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें लाखों की संख्या में जनसैलाब उमड़ता है। मान्यता है कि इन नौ दिनों में उपवास रखने और नौ स्वरूपों की पूजा करने से हर अधूरी मुराद पूरी होती है।

सातों दिन माता के लिए खास छप्पन भोग
खल्लारी माता को प्रसन्न करने के लिए यहाँ सप्ताह के हर दिन का एक विशेष भोग निर्धारित है। सोमवार को तिखुर का हलवा और पान चढ़ाया जाता है तो मंगलवार को सिंघाड़े के हलवे का भोग लगता है। बुधवार को बेसन के लड्डू और खिचड़ी का महत्व है जबकि गुरुवार को खीर-पुड़ी का स्वाद माता को अर्पित होता है। शुक्रवार को पंचमेवा शनिवार को चना-पुड़ी और रविवार को फलों व दाल-चावल का भोग लगाया जाता है। पूर्णिमा जैसे विशेष अवसरों पर मालपुआ और मीठे चावल का खास प्रबंध किया जाता है।
आस्था और सुकून का सुखद अहसास
पहाड़ी की ऊँचाई से दिखने वाला प्राकृतिक नजारा और माता के जयकारों की गूंज मन को असीम शांति प्रदान करती है। खल्लारी माता का यह धाम आस्था इतिहास और प्रकृति का एक अद्भुत मेल है। यहाँ आने वाला हर भक्त एक सुखद अनुभव लेकर लौटता है। मंदिर की व्यवस्थाएं और बढ़ती सुविधाएं अब इसे एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित कर रही हैं जहाँ हर साल भक्तों की संख्या नए रिकॉर्ड बना रही है।
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