
छत्तीसगढ़ के कोष, लेखा एवं पेंशन विभाग में एक बड़ा खुलासा हुआ है जिसने प्रशासनिक और वित्तीय गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। नियमों को ताक पर रखकर ऐसे अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर तैनात कर दिया गया है जिन्होंने अब तक अनिवार्य विभागीय परीक्षा भी पास नहीं की है। ये वही पद हैं जिनकी एक मुहर से सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये के बिल पास होते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इन अधिकारियों की नियुक्तियां 2021 से 2023 के बीच उस दौर में हुई थीं, जब टामन सिंह सोनवानी पीएससी के चेयरमैन थे। अब इन नियुक्तियों और उनके मौजूदा कामकाज को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं।
अयोग्य हाथों में खजाने की चाबी: नियम विरुद्ध हो रहे करोड़ों के भुगतान
विभाग में लेखा अधिकारी और सहायक लेखा अधिकारी जैसे संवेदनशील पदों पर बैठे कई अफसरों ने अब तक अपनी अनिवार्य योग्यता साबित नहीं की है। नियम कहते हैं कि पीएससी से चयन के बाद इन अधिकारियों को एक कठिन विभागीय परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है, जिसके बाद ही उन्हें पूर्ण वित्तीय अधिकार मिलते हैं। लेकिन वर्तमान में बिना इस परीक्षा को पास किए ही इन्हें अलग-अलग विभागों में पोस्टिंग दे दी गई है। अब ये अधिकारी टेंडर प्रक्रिया से लेकर निर्माण कार्यों और सरकारी खरीदी के करोड़ों रुपये के बिलों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन है।
बजट और टेंडर में अहम भूमिका: क्या सुरक्षित है जनता का पैसा?
लेखा अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल दफ्तर तक सीमित नहीं होती। इन्हें अलग-अलग विभागों की वित्त शाखाओं में तैनात किया जाता है जहां इनका मुख्य काम बिलों का सूक्ष्म परीक्षण और फिजूलखर्ची पर लगाम लगाना है। विभागीय बजट तैयार करने से लेकर बड़े टेंडर जारी करने तक में इनकी राय निर्णायक होती है। जिला कोषालय में तैनात ये अफसर ही कर्मचारियों की तनख्वाह और बुजुर्गों की पेंशन जारी करते हैं। ऐसे में बिना प्रशिक्षित और बिना परीक्षा पास किए अधिकारियों का इन पदों पर होना सरकारी धन के दुरुपयोग के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
सोनवानी काल का ‘विरासत’ कनेक्शन: नियुक्तियों की टाइमिंग पर संदेह
इन विवादास्पद नियुक्तियों का सीधा संबंध 2021 से 2023 के कालखंड से जोड़ा जा रहा है। यह वही समय था जब पीएससी की चयन प्रक्रिया पर पहले ही कई सवाल उठ चुके थे और टामन सिंह सोनवानी चेयरमैन पद पर काबिज थे। जानकारों का कहना है कि उस दौरान भर्ती हुए अधिकारियों को मौजूदा समय में फील्ड पोस्टिंग देकर बड़े वित्तीय अधिकार सौंप दिए गए हैं। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि क्या यह महज एक संयोग है या फिर नियमों को जानबूझकर शिथिल किया गया ताकि चहेतों को महत्वपूर्ण कुर्सियों पर बैठाया जा सके।
नियमों की अनदेखी: प्रशिक्षण के बजाय सीधे मिलीं मलाईदार पोस्टिंग
विभाग के पुराने नियमों के अनुसार, जब तक कोई अधिकारी विभागीय परीक्षा पास नहीं कर लेता था, उसे स्वतंत्र रूप से किसी विभाग का वित्त प्रभार नहीं दिया जाता था। ऐसे अधिकारी मुख्य कार्यालय में रहकर वरिष्ठों के मार्गदर्शन में काम सीखते थे और केवल वेतन पाने के हकदार होते थे। उन्हें वित्तीय निर्णय लेने या बिल पास करने की शक्ति नहीं दी जाती थी। लेकिन पिछले तीन सालों में यह स्वस्थ परंपरा टूट गई है। अब बिना अनुभव और बिना योग्यता जांचे ही अधिकारियों को सीधे ‘मलाईदार’ पोस्टिंग दी जा रही है, जिससे पूरे सिस्टम की साख दांव पर लग गई है।
वित्तीय अनुशासन पर खतरा: गलत भुगतान और भ्रष्टाचार की आशंका
बिना ट्रेनिंग और बिना परीक्षा के बिलों की जांच करने से सिस्टम में बड़ी चूक की संभावना बनी रहती है। एक छोटा सा गलत हस्ताक्षर भी राजकोष को करोड़ों का चूना लगा सकता है। टेंडर की बारीकियों को न समझ पाने के कारण चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने या तकनीकी खामियों को नजरअंदाज करने का डर भी बना रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वित्तीय साक्षरता की कमी वाले अधिकारियों से ऑडिट और बजटिंग में होने वाली गलतियां भविष्य में सरकार के लिए बड़ी कानूनी मुसीबत बन सकती हैं।
जांच की तेज होती मांग: क्या फिर से होगी योग्यता की परख?
मामले के उजागर होने के बाद अब राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर जांच की मांग उठने लगी है। सोशल मीडिया से लेकर कर्मचारी संगठनों के बीच यह चर्चा आम है कि आखिर किसके दबाव में इन अयोग्य अधिकारियों को इतने महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए। क्या सरकार इन नियुक्तियों की समीक्षा करेगी? क्या बिना परीक्षा पास किए अफसरों को वापस मूल विभाग में अटैच किया जाएगा? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अब सरकार को देना होगा। यह मामला केवल कुछ नियुक्तियों का नहीं, बल्कि प्रदेश की समूची वित्तीय व्यवस्था की शुचिता से जुड़ा है।
सिस्टम में सुधार की जरूरत: पारदर्शिता बहाली ही एकमात्र रास्ता
इस पूरे प्रकरण ने छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक ढांचे की कमियों को उजागर कर दिया है। जानकारों का कहना है कि वित्तीय पारदर्शिता बहाल करने के लिए अनिवार्य विभागीय परीक्षा को सख्ती से लागू करना होगा। योग्यता के आधार पर ही पोस्टिंग देने की पुरानी परंपरा को वापस लाना जरूरी है। जब तक चयन से लेकर तैनाती तक की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी, तब तक सरकारी खजाने पर ऐसे खतरे मंडराते रहेंगे। फिलहाल, यह मुद्दा अब सरकार के लिए गले की हड्डी बन चुका है, जहां उसे अपनी जीरो टॉलरेंस की नीति को साबित करना होगा।



