
Saraswati Shishu Mandir Bodra: छत्तीसगढ़ के मगरलोड क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम बोड़रा में बच्चों के सर्वांगीण विकास को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। बच्चों की शिक्षा और उनके बेहतर भविष्य के निर्माण में माता-पिता और शिक्षकों की समान भागीदारी तय करने के उद्देश्य से साहू सामुदायिक भवन में एक दिवसीय ‘अभिभावक जनसंवाद’ कार्यक्रम रखा गया। सरस्वती शिशु मंदिर बोड़रा और पालक समिति के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस आयोजन में बड़ी संख्या में ग्रामीणों, अभिभावकों और शिक्षकों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के दौरान बच्चों की आदतों और उनके सीखने के तौर-तरीकों पर खुलकर विचार साझा किए गए।
इंसानियत की शिक्षा पर केंद्रित हो ध्यान, प्रधानाचार्य ने भौतिकवादी सोच पर जताई चिंता
Magarlod News: जनसंवाद को संबोधित करते हुए सरस्वती शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य शंकर लाल ने आज की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक सोच पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चों के भीतर इंसानियत और नैतिक मूल्यों को जगाना होना चाहिए। इसके विपरीत, आज समाज में पढ़ाई-लिखाई का उपयोग अधिक से अधिक धन कमाने के साधन के रूप में किया जा रहा है, जिससे सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ रहा है। उन्होंने पालकों से आग्रह किया कि वे बच्चों को सफल होने के साथ-साथ एक अच्छा इंसान बनने के लिए भी प्रेरित करें।
संवादहीनता बन रही है समस्याओं की वजह, ‘अभिभावक विद्यालय’ से सुधरेगी शिक्षा की गुणवत्ता
कार्यक्रम में मौजूद विद्यालय के संयोजक टोमन लाल साहू ने पारिवारिक और शैक्षणिक रिश्तों में आ रही दूरियों पर अपनी बात रखी। उनका कहना था कि आज के दौर में माता-पिता और बच्चों के बीच बढ़ती संवादहीनता ही अधिकांश समस्याओं की मुख्य वजह बनती जा रही है। आपस में बातचीत की कमी के कारण बच्चे अपनी भावनाएं ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते। इसी कड़ी में प्रभा बहन ने ‘अभिभावक विद्यालय’ की अवधारणा को सामने रखते हुए बताया कि जब पालक और स्कूल मिलकर काम करेंगे, तभी शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है।
आचरण और आदतों को लेकर उठे गंभीर सवाल, बच्चों के सीखने की प्रक्रिया पर हुआ मंथन
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए ताम्रध्वज ने उपस्थित अभिभावकों के सामने कुछ बुनियादी सवाल रखे। उन्होंने पालकों से पूछा कि आज इंसान का आचरण निश्चित है या अनिश्चित। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी सोचने को मजबूर किया कि हम अपना सबसे ज्यादा समय शरीर की सुख-सुविधाओं के लिए लगाते हैं या मन और विचारों को शुद्ध करने के लिए। जनसंवाद में इस बात पर भी विस्तार से मंथन हुआ कि बच्चों के सीखने की सहज प्रक्रिया क्या है, उसमें किस तरह की बाधाएं आती हैं और घर व स्कूल एक-दूसरे के पूरक बनकर कैसे काम कर सकते हैं।
पालकों ने माना पहले खुद में करना होगा सुधार, सार्थक चर्चा को लेकर दिया सकारात्मक फीडबैक
कार्यक्रम के अंतिम चरण में उपस्थित अभिभावकों ने अपनी प्रतिक्रियाएं और फीडबैक साझा किया। ग्रामीणों और पालकों ने माना कि यह चर्चा उनके लिए बेहद आंखें खोलने वाली रही। अभिभावकों ने सामूहिक रूप से स्वीकार किया कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में बड़ों को करते हुए देखते हैं। इसलिए अगर बच्चों के व्यवहार और आदतों में कोई अच्छा बदलाव देखना है, तो सबसे पहले बदलाव की शुरुआत माता-पिता को खुद के आचरण से करनी होगी। कार्यक्रम के समापन पर सभी ने बच्चों के परिवेश को और बेहतर बनाने का संकल्प लिया।



