संकट में RTE: प्राइवेट स्कूलों ने किया दाखिला न देने का ऐलान, प्रतिपूर्ति राशि को लेकर सरकार और एसोसिएशन में ठनी

छत्तीसगढ़ में शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत गरीब बच्चों के मुफ्त दाखिले पर इस साल बड़ा खतरा मंडरा रहा है। प्रदेश के निजी स्कूल संचालकों और शिक्षा विभाग के बीच ‘प्रतिपूर्ति राशि’ को लेकर चल रहा विवाद अब आर-पार की जंग में बदल गया है। छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने साफ कर दिया है कि जब तक सरकार उनकी मांगें पूरी नहीं करती, वे किसी भी बच्चे को आरटीई के तहत प्रवेश नहीं देंगे। एसोसिएशन ने इसे अपना ‘असहयोग आंदोलन’ करार दिया है, जिससे हजारों गरीब परिवारों के बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया है।

एडमिशन प्रक्रिया पर लगा ब्रेक: 21 हजार सीटों के लिए आए 38 हजार से ज्यादा आवेदन

इस साल राज्य के 6861 निजी स्कूलों में आरटीई के तहत 21,698 सीटें निर्धारित की गई हैं। इन सीटों के लिए अब तक प्रदेश भर से 38,438 आवेदन जमा हो चुके हैं, जो उपलब्ध सीटों से लगभग दोगुने हैं। एक तरफ जहां अभिभावक अपने बच्चों के अच्छे स्कूलों में दाखिले की उम्मीद लगाए बैठे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्राइवेट स्कूलों की इस हड़ताल ने पूरे शिक्षा तंत्र में असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। रायपुर प्रेस क्लब में हुई प्रेस वार्ता में एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने दो टूक शब्दों में कहा कि इस साल वे लॉटरी प्रक्रिया और दाखिले में बिल्कुल सहयोग नहीं करेंगे।

13 साल से नहीं बढ़ी राशि: 2011 के पुराने रेट पर मिल रहा भुगतान

प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन की नाराजगी की मुख्य वजह प्रतिपूर्ति राशि (Reimbursement) का न बढ़ना है। साल 2011 में जब आरटीई लागू हुआ था, तब कक्षा पहली से पांचवीं तक के लिए 7000 रुपये और छठवीं से आठवीं के लिए 11,400 रुपये प्रति विद्यार्थी सालाना तय किए गए थे। हैरानी की बात यह है कि 13 साल बीत जाने के बाद भी सरकार इसी पुरानी दर पर भुगतान कर रही है। स्कूलों का कहना है कि आज के समय में महंगाई और शिक्षा के खर्च को देखते हुए इस मामूली राशि में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना नामुमकिन है।

हाई कोर्ट के आदेश की अनदेखी: 6 महीने बीतने के बाद भी नहीं हुआ फैसला

अपनी मांगों को लेकर एसोसिएशन ने जुलाई 2025 में बिलासपुर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि वे एसोसिएशन के अभ्यावेदन पर 6 महीने के भीतर विचार कर कार्रवाई करें। एसोसिएशन का आरोप है कि हाई कोर्ट की समय सीमा समाप्त होने के बावजूद स्कूल शिक्षा विभाग ने इस पर कोई संवेदनशील फैसला नहीं लिया। विभाग के इसी सुस्त रवैये से नाराज होकर स्कूलों ने 1 मार्च से असहयोग आंदोलन का रास्ता चुना है।

गरीब बच्चों का भविष्य दांव पर: शिक्षा विभाग की संवेदनहीनता पर उठे सवाल

प्राइवेट स्कूलों के इस कड़े फैसले का सीधा असर समाज के वंचित और कमजोर वर्ग के बच्चों पर पड़ेगा। एसोसिएशन का कहना है कि वे खुद नहीं चाहते कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो, लेकिन सरकार की अनदेखी ने उन्हें मजबूर कर दिया है। अगर इसी महीने शुरू होने वाली प्रवेश प्रक्रिया रुकती है, तो हजारों बच्चे शिक्षा के मुख्य अधिकार से वंचित रह जाएंगे। स्कूलों का तर्क है कि वे अब घाटा सहकर गुणवत्ता के साथ समझौता नहीं कर सकते, इसलिए सरकार को तुरंत दखल देना चाहिए।

2018 में शामिल हुई थी 9वीं से 12वीं: राशि में अंतर से भी है नाराजगी

सरकार ने साल 2018 में आरटीई का दायरा बढ़ाकर इसमें 9वीं से 12वीं कक्षा को भी शामिल किया था, जिसके लिए 15,000 रुपये प्रति छात्र तय किए गए। हालांकि, शुरुआती कक्षाओं के लिए राशि आज भी 2011 के स्तर पर ही अटकी हुई है। एसोसिएशन का कहना है कि उन्होंने साल 2016 से ही लगातार पत्राचार और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के जरिए अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन विभाग ने इसे केवल टालने का काम किया है। अब जब पानी सिर से ऊपर निकल गया है, तब स्कूलों ने दाखिला पोर्टल के बहिष्कार का निर्णय लिया है।

एसोसिएशन की चेतावनी: जब तक मांगें पूरी नहीं, तब तक जारी रहेगा आंदोलन

एसोसिएशन के अध्यक्ष ने साफ किया है कि उनकी लड़ाई निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि स्कूलों के अस्तित्व को बचाने के लिए है। उन्होंने चेतावनी दी है कि जब तक राज्य सरकार हाई कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए प्रतिपूर्ति राशि में सम्मानजनक बढ़ोतरी नहीं करती, उनका आंदोलन खत्म नहीं होगा। ऑनलाइन माध्यम से चयनित विद्यार्थियों को स्कूलों में जो रिपोर्टिंग करनी होती है, उसे इस बार स्कूल स्वीकार नहीं करेंगे। इस विवाद से अब उन हजारों पालकों की नींद उड़ गई है जिन्होंने बड़ी उम्मीदों से ऑनलाइन फॉर्म भरे थे।

क्या निकलेगा बीच का रास्ता? अभिभावकों की नजरें सरकार पर टिकीं

वर्तमान स्थिति को देखते हुए अब सबकी निगाहें स्कूल शिक्षा विभाग और मुख्यमंत्री कार्यालय पर टिकी हैं। अगर सरकार जल्द ही प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन के प्रतिनिधियों के साथ टेबल पर बैठकर कोई ठोस आश्वासन नहीं देती, तो छत्तीसगढ़ में इस साल आरटीई का सत्र शून्य हो सकता है। अभिभावक संघों ने भी सरकार से अपील की है कि बच्चों को इस विवाद का मोहरा न बनाया जाए और जल्द से जल्द कोई बीच का रास्ता निकालकर एडमिशन प्रक्रिया को सुचारू रूप से शुरू किया जाए।

Also Read: Admission in Atmanand School: 10 अप्रैल से आत्मानंद स्कूलों में एडमिशन होगी शुरू, आवेदन प्रक्रिया, जानें क्या हैं नए नियम

दक्षिण कोसल का Whatsapp Group ज्वाइन करे

Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

Related Articles

Back to top button