
छत्तीसगढ़ सरकार में 14वें मंत्री की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई फिलहाल टल गई है। बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में यह मामला विचार के लिए लगा था। अदालत ने इस पूरे विषय को बेहद गंभीर मानते हुए सुनवाई को चार सप्ताह के लिए आगे बढ़ाने का आदेश दिया है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वासु चक्रवर्ती की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता किशोर भादुड़ी ने कोर्ट में पक्ष रखा।
हाईकोर्ट ने क्यों बढ़ाई चार सप्ताह की तारीख
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न है। इस प्रकार के संवेदनशील विषय पर जल्दबाजी में कोई भी आदेश जारी नहीं किया जा सकता। अदालत का मानना है कि इस प्रकरण में शामिल सभी विधिक पहलुओं और पक्षों की दलीलों को गहराई से सुनना आवश्यक है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सुनवाई को एक महीने के लिए टालने का फैसला किया।
जानिए क्या है 14वें मंत्री की नियुक्ति से जुड़ा पूरा विवाद
इस पूरे विवाद की शुरुआत मुख्यमंत्री के नेतृत्व में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान हुई थी। राज्य सरकार ने मंत्रिमंडल में 14वें मंत्री को शामिल किया, जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिका में कहा गया है कि इस नियुक्ति की न्यायिक समीक्षा जरूरी है, क्योंकि यह सीधे तौर पर संविधान के नियमों से जुड़ी हुई है। अब हाईकोर्ट इस याचिका पर विस्तार से सुनवाई करेगा।
15 प्रतिशत वाले संवैधानिक नियम पर उठा सवाल
मंत्रिमंडल के गठन को लेकर मुख्य विवाद 2003 के संवैधानिक संशोधन से जुड़ा है। नियमों के मुताबिक, किसी भी राज्य में मंत्रियों की कुल संख्या वहां की विधानसभा के कुल सदस्यों के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। छत्तीसगढ़ विधानसभा में कुल 90 विधायक हैं। इस गणित के हिसाब से 15 प्रतिशत का आंकड़ा 13.5 बैठता है। विपक्ष का तर्क है कि इस व्यावहारिक सीमा का उल्लंघन करके 14वें मंत्री को शपथ दिलाई गई है।
पूर्ववर्ती सरकार के प्रस्ताव और केंद्र के फैसले का हवाला
इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज रही है। पूर्व में सत्तारूढ़ रही कांग्रेस का कहना है कि उनकी सरकार के समय राज्य में मंत्रियों की सीमा को 15 से बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने का एक प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था। हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से उस समय इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिली थी। इसके बावजूद नए मंत्रिमंडल विस्तार में 14 मंत्रियों को शामिल किए जाने पर विपक्ष ने इसे असंवैधानिक करार दिया था।
करीब एक साल पुराने विवाद पर कानूनी मंथन जारी
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद से ही यह मामला कानूनी और राजनीतिक चर्चाओं में बना हुआ है। याचिका दायर होने के बाद से अदालत इस पर विचार कर रही है। हाईकोर्ट में हुई ताजा सुनवाई में दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं ने अपनी बात रखी, जिसके बाद पीठ ने इसे तुरंत निपटाने के बजाय विस्तृत बहस के लिए रख लिया है। अब यह एक साल पुराना विवाद कानूनी पचड़े में फंसा हुआ है।
नए मुख्य न्यायाधीश की बेंच में हो सकती है अगली सुनवाई
चार सप्ताह की मोहलत मिलने के बाद अब इस मामले की अगली सुनवाई एक महीने बाद होगी। कानूनी जानकार संभावना जता रहे हैं कि अगली सुनवाई के समय तक पीठ के गठन में बदलाव हो सकता है और यह मामला नए मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष सूचीबद्ध हो सकता है। अगली सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से इस नियुक्ति के पक्ष में दलीलें पेश की जाएंगी।



