
छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशकों से जारी माओवादी संघर्ष अब अपने निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। केंद्र और राज्य सरकार ने 31 मार्च 2026 तक इस क्षेत्र से नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा है। सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और लगातार ऑपरेशनों के बीच सरकार का दावा है कि लाल आतंक की जड़ें अब उखड़ चुकी हैं। हालांकि, बंदूकों के शांत होने की इस खबर के बीच बस्तर के आदिवासियों के मन में भविष्य को लेकर कई गहरी चिंताएं जन्म ले रही हैं। माओवाद के खात्मे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यहां के प्राकृतिक संसाधनों और आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों का क्या होगा।
2026 की डेडलाइन: क्या बस्तर में वाकई लौटने वाली है स्थायी शांति?
सरकार ने नक्सल उन्मूलन के लिए मार्च 2026 की समयसीमा तय की है। दावा किया जा रहा है कि इस तारीख के बाद बस्तर के गांव-गांव में सड़क, बिजली और मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाएं बिना किसी बाधा के पहुंच सकेंगी। सुरक्षा कैंपों की बढ़ती संख्या ने माओवादियों के सप्लाई नेटवर्क को तोड़ दिया है। लेकिन स्थानीय लोग इसे केवल शांति की वापसी नहीं मान रहे हैं। उनके लिए शांति का मतलब केवल हिंसा का अंत नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और आजीविका की सुरक्षा भी है।
सुरक्षा कैंपों का भविष्य: आतंक खत्म होने के बाद क्या हटेंगे पहरेदार?
नक्सल विरोधी अभियान के तहत बस्तर के अंदरूनी इलाकों में हर 3 से 5 किलोमीटर पर सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित किए गए हैं। ग्रामीणों के मन में यह शंका है कि जब माओवाद पूरी तरह खत्म हो जाएगा, तो क्या ये कैंप वापस हटाए जाएंगे। यदि ये स्थाई ठिकाने बन गए, तो क्या स्थानीय लोग अपनी मांगों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठा पाएंगे? आदिवासियों को डर है कि सुरक्षा के नाम पर कहीं उनकी निजी आजादी और ग्राम सभाओं के अधिकारों का दायरा छोटा न हो जाए।
कॉरपोरेट की नजर: बस्तर के बेशकीमती खनिजों पर टिकी बड़ी कंपनियों की निगाहें
बस्तर की धरती लौह अयस्क, बॉक्साइट, टिन और ग्रेनाइट जैसे बहुमूल्य खनिजों से भरी हुई है। लंबे समय से बड़े औद्योगिक घराने इन संसाधनों के दोहन की ताक में हैं। माओवादी हिंसा के कारण कई प्रोजेक्ट ठप पड़े थे या धीमी गति से चल रहे थे। अब जब हिंसा कम हो रही है, तो खनन परियोजनाओं में अचानक तेजी आई है। रावघाट और आमदाई घाटी जैसे क्षेत्रों में शुरू हुई गतिविधियां इस बात का संकेत हैं कि आने वाले दिनों में संसाधनों के दोहन को लेकर खींचतान और बढ़ सकती है।
पड़ोसी राज्य का सबक: गढ़चिरौली के उदाहरण से सहमे हुए हैं ग्रामीण
आदिवासी समाज अक्सर महाराष्ट्र के गढ़चिरौली का उदाहरण देता है। वहां जैसे ही माओवादी प्रभाव कम हुआ, बड़े पैमाने पर औद्योगिक और खनन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। स्थानीय लोगों का मानना है कि इससे विकास तो आया, लेकिन पर्यावरण की भारी कीमत चुकानी पड़ी। पहाड़ों की खुदाई और जंगलों की कटाई से हवा और पानी दोनों प्रदूषित हुए हैं। बस्तर के लोग नहीं चाहते कि विकास के नाम पर उनके पहाड़ों को खोदकर उन्हें उनके ही घर से बेदखल कर दिया जाए।
विद्रोहों का इतिहास: 18वीं सदी से ही बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ रहा है बस्तर
बस्तर में संघर्ष की कहानी माओवाद से बहुत पुरानी है। 1774 के हल्बा विद्रोह से लेकर 1910 के ऐतिहासिक ‘भूमकाल आंदोलन’ तक, यहां के आदिवासियों ने हमेशा अपनी स्वायत्तता के लिए लड़ाई लड़ी है। गुंडाधुर जैसे नायकों की विरासत आज भी यहां के लोगों के खून में है। चाहे ब्रिटिश शासन रहा हो या आजादी के बाद का दौर, जल-जंगल और जमीन पर कब्जे की किसी भी कोशिश का आदिवासियों ने डटकर मुकाबला किया है। यह संघर्ष माओवाद से प्रेरित नहीं, बल्कि अपनी पहचान बचाने की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।
ग्राम सभा की शक्ति: क्या कानून और कागजों में सिमटकर रह जाएंगे अधिकार?
आदिवासी समाज ने पिछले दशकों में बैलाडीला और लोहंडीगुड़ा जैसी बड़ी परियोजनाओं के खिलाफ सफल आंदोलन किए हैं। कई बार ग्राम सभाओं ने एकजुट होकर बड़ी कंपनियों को पीछे हटने पर मजबूर किया। लेकिन अब बदली हुई परिस्थितियों में उन्हें डर है कि विकास की तेज रफ्तार में कहीं ग्राम सभाओं के प्रस्तावों को नजरअंदाज न कर दिया जाए। पेसा (PESA) कानून और वनाधिकार अधिनियम के सही क्रियान्वयन को लेकर आदिवासी समुदाय आज भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिख रहा है।
विकास बनाम अस्तित्व: एक जटिल मोड़ पर खड़ा है अबूझमाड़ का भविष्य
नक्सलवाद का अंत बस्तर के लिए एक नई सुबह जैसा हो सकता है, लेकिन यह सुबह अपने साथ विकास और अस्तित्व के बीच एक बड़ा द्वंद्व लेकर आई है। सरकार के लिए चुनौती केवल सड़कें बनाना नहीं है, बल्कि आदिवासियों का भरोसा जीतना है। क्या सरकार उन्हें इस विकास प्रक्रिया में साझीदार बनाएगी या उन्हें केवल विस्थापितों की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाएगा? बस्तर के भविष्य का फैसला इसी बात से होगा कि संसाधनों के इस खेल में अंतिम निर्णय किसका होगा।
निर्णायक मोड़: क्या जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों का हक रहेगा बरकरार?
अंततः बस्तर की कहानी अब बंदूकों से हटकर अधिकारों की मेज पर आ गई है। माओवाद का सफाया एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसके बाद शुरू होने वाली ‘संसाधनों की जंग’ कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती है। बस्तर का आदिवासी समाज आज सरकार से आश्वासन नहीं, बल्कि अपने संवैधानिक अधिकारों की गारंटी चाहता है। विकास की इस नई इबारत में आदिवासियों की भूमिका और उनके पारंपरिक अधिकारों का संरक्षण ही बस्तर की वास्तविक शांति का आधार बनेगा।



