
History of The Indian National Flag:15 अगस्त और 26 जनवरी भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तारीखें हैं। जहां एक ओर हम आजादी का जश्न मनाते हैं, वहीं दूसरी ओर संविधान को अपनाने के गौरव को याद करते हैं। इन दोनों ही मौकों पर देश के कोने-कोने में तिरंगा शान से फहराया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिसे हम आज राष्ट्रीय ध्वज के रूप में देखते हैं, उसके पीछे दशकों का संघर्ष और बदलाव का एक लंबा सफर छिपा है। आइए जानते हैं कि तीन रंगों वाला यह ध्वज भारत की पहचान कैसे बना।
पिंगली वेंकैया: तिरंगे के असली शिल्पकार
भारत के राष्ट्रीय ध्वज को डिजाइन करने का श्रेय आंध्र प्रदेश के मछलीपत्तनम के रहने वाले पिंगली वेंकैया को जाता है। 2 अगस्त 1876 को जन्मे वेंकैया बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने मद्रास और कैंब्रिज विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी। वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि संस्कृत, उर्दू और जापानी जैसी कई भाषाओं के जानकार भी थे। उनके भीतर देश के लिए अपना एक झंडा होने की तड़प दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश सेना में काम करने के दौरान जगी थी।
दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी से मुलाकात और झंडे का विचार
जब पिंगली वेंकैया ब्रिटिश इंडियन आर्मी में थे, तब उन्हें दक्षिण अफ्रीका के युद्ध में भेजा गया था। उसी दौरान उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। गांधीजी के विचारों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। वहां जब भी उन्हें ब्रिटिश झंडे ‘यूनियन जैक’ को सलामी देनी पड़ती, तो उन्हें महसूस होता कि भारत का अपना एक स्वतंत्र प्रतीक होना चाहिए। भारत लौटने के बाद उन्होंने ‘नेशनल फ्लैग मिशन’ की शुरुआत की और झंडे के ढेरों डिजाइन तैयार किए।
विजयवाड़ा अधिवेशन और गांधीजी का वह अहम सुझाव
साल 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन के दौरान वेंकैया ने गांधीजी को अपना डिजाइन दिखाया। शुरुआती झंडे में केवल लाल और हरा रंग था, जो उस समय दो बड़े समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे। गांधीजी ने इसमें पूरे भारत की झलक देखने के लिए बीच में सफेद रंग की पट्टी जोड़ने का सुझाव दिया। साथ ही, राष्ट्र की प्रगति और आत्मनिर्भरता को दर्शाने के लिए बीच में चरखे को स्थान दिया गया। इस झंडे को तब ‘स्वराज ध्वज’ कहा जाने लगा।
रंगों का बदलाव और अशोक चक्र का आगमन
समय के साथ तिरंगे के स्वरूप में और सुधार हुए। 1931 में लाल रंग को हटाकर केसरिया रंग को सबसे ऊपर जगह दी गई, जो साहस और बलिदान का प्रतीक बना। आजादी के ठीक पहले 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा की बैठक में एक और बड़ा बदलाव हुआ। झंडे के बीच से चरखे को हटाकर सम्राट अशोक के धर्मचक्र को शामिल किया गया। नीले रंग का यह चक्र न्याय और निरंतर प्रगति का प्रतीक है, जिसकी 24 तिल्लियां दिन के 24 घंटों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
लाल किले पर पहली बार फहराया गया गौरव
करीब 36 साल की लंबी मेहनत और कई संशोधनों के बाद वर्तमान तिरंगे को अंतिम मंजूरी मिली। तिरंगे की लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 तय किया गया ताकि इसमें एकरूपता बनी रहे। 15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने पर पहली बार इसे लाल किले की प्राचीर से फहराया गया। आज पिंगली वेंकैया द्वारा डिजाइन किया गया यह ध्वज न केवल एक कपड़ा है, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की एकता, अखंडता और बलिदान की जीवित कहानी है।



