AI Fake Forest Rights Land Lease: छत्तीसगढ़ में AI से बने फर्जी वन अधिकार पट्टे: 500 आदिवासियों से लाखों की ठगी, जानिए पूरा मामला

AI Fake Forest Rights Land Lease: छत्तीसगढ़ में वन अधिकार पट्टों को लेकर एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। जालसाजों ने पट्टों को असली जैसा दिखाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक का सहारा लिया। इस फर्जीवाड़े में कोटा और लोरमी इलाके के करीब 400 से 500 आदिवासियों को निशाना बनाया गया है। पीड़ितों का आरोप है कि उनसे प्रति पट्टा 30 हजार रुपये तक ऐंठे गए। स्थानीय डीएफओ ने शुरुआती जांच में इन दस्तावेजों को पूरी तरह फर्जी करार दिया है। विधानसभा में भी यह मामला जोर-शोर से उठा है, जहां सरकार से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की जा रही है।

30-30 हजार रुपये लेकर बांटे गए नकली वन अधिकार पट्टे

पारंपरिक रूप से जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को जमीन का कानूनी हक देने के लिए वन अधिकार कानून बनाया गया था। हालांकि ठगों के गिरोह ने इसी कानून का नाजायज फायदा उठाना शुरू कर दिया। गिरोह के सदस्य पहले झूठे रिकॉर्ड बनाते हैं और फिर सरकारी आदेश जैसी भाषा में पट्टे छाप देते हैं। अब एआई की मदद से सरकारी मुहर और प्रारूप की हुबहू नकल की जा रही है। ग्रामीणों को यह भरोसा दिलाया जाता है कि उनका नाम सरकारी सूची में दर्ज हो गया है और इसके एवज में उनसे भारी रकम वसूल ली जाती है।

सरकारी रिकॉर्ड की जांच में खुली फर्जीवाड़े की पोल

लोरमी क्षेत्र के निवासी भगत राम के परिवार से पट्टा दिलाने के नाम पर 30 हजार रुपये लिए गए थे। जब उन्होंने अपने कागजात का सरकारी सत्यापन कराया, तो पता चला कि उस नंबर का कोई पट्टा रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं है। वन विभाग के अधिकारियों ने मौके पर ही कागजात को फर्जी घोषित कर दिया। ऐसी ही आपबीती कोटा के भुलउ राम की है, जिन्हें कागजात देकर जमीन पर मालिकाना हक मिलने का झांसा दिया गया था। जांच के दौरान उनके दस्तावेज भी पूरी तरह संदिग्ध पाए गए।

डीएफओ के बयान के बाद भी कार्रवाई सुस्त होने पर उठे सवाल

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब डीएफओ खुद सार्वजनिक रूप से दस्तावेजों को जाली बता रहे हैं, तो अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं हुई? साइबर सेल या विशेष जांच दल (SIT) का गठन करके ठोस कार्रवाई क्यों शुरू नहीं की गई? जानकारों का कहना है कि वन अधिकार पट्टा जारी करने में वन विभाग, राजस्व विभाग और स्थानीय प्रशासन के रिकॉर्ड का मिलान जरूरी होता है। मामले की तह तक जांच होने पर कई निचले और मध्यम स्तर के कर्मचारियों की संलिप्तता उजागर हो सकती है।

फर्जी पट्टे बांटने के खेल में राजस्व विभाग की भूमिका भी घेरे में

विधानसभा सत्र के दौरान विपक्ष ने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में राजस्व कर्मचारियों की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता। किसी भी वन अधिकार पट्टे की स्वीकृति ग्राम सभा की सिफारिश, राजस्व रिकॉर्ड की पड़ताल, वन विभाग की एनओसी और जिला स्तरीय समिति के अनुमोदन के बाद ही होती है। इतने चरणों से गुजरने वाले दस्तावेज अगर इतनी बड़ी संख्या में फर्जी निकल रहे हैं, तो प्रशासनिक अमले की लापरवाही या मिलीभगत स्पष्ट नजर आती है।

कोटा विधायक ने वन मंत्री से शिकायत कर कार्रवाई की मांग की

कोटा क्षेत्र के विधायक अटल श्रीवास्तव ने इस पूरे मामले को विधानसभा में उठाया। उनका कहना है कि पीड़ित आदिवासियों ने जब वन मंत्री से इस धोखाधड़ी की शिकायत की, तब भी विभागीय स्तर पर कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया। विस्तृत जांच न होने के कारण जाली दस्तावेज बनाने वाला गिरोह अब भी सक्रिय है और अन्य सीधे-साधे ग्रामीणों को निशाना बना रहा है।

सत्ता परिवर्तन के बाद पारदर्शी जांच की बढ़ी उम्मीदें

प्रदेश में सरकार बदलने के बाद कई पुराने घोटालों और अनियमितताओं की दोबारा जांच शुरू की गई है। कोयला और आबकारी मामलों में जांच एजेंसियां लगातार कार्रवाई कर रही हैं। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि वन अधिकार पट्टा घोटाले में भी उच्च स्तरीय जांच बैठाई जाएगी। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो ठगी के शिकार हुए सैकड़ों आदिवासी परिवार सालों तक न्याय पाने के लिए भटकते रहेंगे।

सामाजिक विश्वास और व्यवस्था पर गहराता संकट

वन अधिकार कानून केवल एक कागजी व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह आदिवासियों के जीवन और उनकी आजीविका से जुड़ा भरोसा है। अगर फर्जी पट्टे बेचकर ग्रामीणों को ठगा जाएगा, तो प्रशासनिक व्यवस्था पर से उनका विश्वास उठ जाएगा। यह केवल रुपयों की ठगी का मामला नहीं है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक अपराध भी है।

अब वन विभाग और शासन के रुख पर टिकी सबकी नजरें

विधानसभा में गूंजने और डीएफओ के बयान के बाद अब पूरी जिम्मेदारी वन विभाग और शासन की बनती है। यह देखने वाली बात होगी कि वन मंत्रालय इस मामले में एफआईआर दर्ज कराकर उच्चस्तरीय जांच के आदेश देता है या नहीं। निष्पक्ष जांच के जरिए ही असली दोषियों तक पहुंचा जा सकता है और ठगी के शिकार आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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