
Dhamtari Rudreshwar Dham: धमतरी शहर से करीब 7 किलोमीटर दूर महानदी के पावन तट पर स्थित रुद्री का प्राचीन रुद्रेश्वर महादेव मंदिर इन दिनों आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है। पवित्र सावन महीने में यहां हर रोज हजारों श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंच रहे हैं। छत्तीसगढ़ के प्रमुख शिवधामों में शुमार इस मंदिर में इस वर्ष सावन के दौरान पहली बार वाराणसी की प्रसिद्ध गंगा आरती की तर्ज पर महानदी आरती का भव्य आयोजन किया जा रहा है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग जुट रहे हैं।

राम वनगमन परंपरा से जुड़ा है स्वयंभू रुद्रेश्वर धाम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वनवास काल के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने इस स्थान पर विश्राम किया था। उन्होंने यहां शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव की विधिवत आराधना की थी और आगे का मार्ग तय किया था। इसी वजह से रुद्रेश्वर धाम को राम वनगमन पथ का प्रमुख अंग माना जाता है। मंदिर परिसर में विराजमान शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है, जो किसी इंसानी तराश के बिना स्वयं धरती से प्रकट हुआ था।

शिवपुराण और स्कंद पुराण में मिलता है रुद्रेश्वर तीर्थ का उल्लेख
स्थानीय धार्मिक परंपराओं और विद्वानों के मुताबिक, रुद्रेश्वर महादेव की महिमा का वर्णन शिवपुराण और स्कंद पुराण में भी मिलता है। सावन का महीना शुरू होते ही इस पूरे मंदिर क्षेत्र का वातावरण भक्तिमय हो जाता है। तड़के सुबह 4 बजे से ही श्रद्धालुओं की कतारें लगनी शुरू हो जाती हैं। धमतरी और आसपास के जिलों के अलावा पड़ोसी राज्य ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से भी बड़ी संख्या में लोग मनोकामना लेकर यहां पहुंचते हैं।
कांवड़ियों के लिए विशेष व्यवस्था और रामायण पाठ का आयोजन
सावन के पूरे महीने मंदिर परिसर में अखंड रामायण पाठ चलता रहता है। क्षेत्र के कांवड़िये अपनी यात्रा की शुरुआत में सबसे पहले रुद्रेश्वर महादेव का जल से अभिषेक करते हैं, जिसके बाद ही अन्य शिव मंदिरों के लिए रवाना होते हैं। मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय प्रशासन की ओर से दूर-दराज से आने वाले कांवड़ियों के लिए निशुल्क भोजन, स्वच्छ पेयजल और रात्रि विश्राम का प्रबंध किया गया है।
पहली बार शुरू हुई बनारस के तर्ज पर महाआरती की परंपरा
इस वर्ष सावन सोमवार के अवसर पर महानदी के तट पर एक नया और अलौकिक दृश्य देखने को मिल रहा है। स्थानीय युवा ब्रिगेड की पहल पर वाराणसी की तर्ज पर शाम के समय महानदी आरती आयोजित की जा रही है। सावन के पहले सोमवार से शुरू हुई यह परंपरा पूरे महीने के प्रत्येक सोमवार को निभाई जाएगी। धूप, दीप और मंत्रोच्चार के बीच घाट पर होने वाली इस आरती को देखने के लिए शाम ढलते ही हजारों लोग नदी किनारे एकत्र हो जाते हैं।

श्रद्धालुओं की पुरानी यादें और पारंपरिक आस्था
भिलाई से पहुंचे श्रद्धालु सारांश साहू बताते हैं कि वे बीते कई सालों से नियमित रूप से यहां आ रहे हैं। पहले के समय में वे पैदल या साइकिल चलाकर रुद्री पहुंचते थे। उनका कहना है कि मंदिर परिसर में कदम रखते ही असीम आत्मिक शांति का अहसास होता है। यही वजह है कि नई पीढ़ी के लोग भी इस प्राचीन धाम से उतनी ही निष्ठा के साथ जुड़े हुए हैं।

तीजा पर्व और महानदी की बालू से शिवलिंग बनाने की अनूठी परंपरा
स्थानीय महिला श्रद्धालु सोनल ध्रुव और निकिता जैन बताती हैं कि धमतरी क्षेत्र में तीजा पर्व से पहले महानदी में स्नान करने की पुरानी परंपरा रही है। पहले मोहल्ले के लोग समूह बनाकर साइकिलों से यहां आते थे। नदी में स्नान के बाद तट की बालू से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की जाती थी और उस बालू को घर लाकर भी स्थापित किया जाता था। आज के आधुनिक दौर में भी यह परंपरा जीवित है।
श्मशान और शांत नदी तट का अनोखा आध्यात्मिक संगम
रुद्रेश्वर धाम की भौगोलिक स्थिति भी इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है। महानदी का बहता जल, पास में स्थित श्मशान घाट और चारों ओर फैला शांत प्राकृतिक परिवेश तंत्र साधना और भक्ति दोनों के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। पंडितों के अनुसार, जीवन और मृत्यु के इस दुर्लभ संगम स्थल पर भगवान शिव की पूजा करने से मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

सावन के अंतिम सोमवार तक चलेंगे विशेष धार्मिक अनुष्ठान
मंदिर ट्रस्ट के प्रबंधकों ने जानकारी दी है कि सावन के शेष दिनों में भी प्रतिदिन रुद्राभिषेक, विशेष श्रृंगार और देर रात महाआरती के क्रम जारी रहेंगे। अंतिम सोमवार को भीड़ के विशेष प्रबंधन के लिए अतिरिक्त पुलिस बल और वॉलिंटियर्स की तैनाती की गई है, ताकि सभी दर्शनार्थियों को सुलभ और सुरक्षित तरीके से जलाभिषेक करने का अवसर मिल सके।



