Baiga Tribe Fake Caste Certificate Scam: छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण पत्र का बड़ा खेल: स्कूल रिकॉर्ड में सफेदा लगाकर ढीमर बन गए ‘बैगा आदिवासी’, 70 से ज्यादा लोग कर रहे सरकारी नौकरी

Baiga Tribe Fake Caste Certificate Scam: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में विशेष पिछड़ी जनजाति ‘बैगा’ के नाम पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनाने का एक बहुत बड़ा सिंडिकेट सामने आया है. हैरान करने वाली बात यह है कि पिछले डेढ़ दशक यानी करीब 15 साल से यह पूरा खेल धड़ल्ले से चल रहा था और जिला प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी. फर्जीवाड़ा करने वालों ने सरकारी रिकॉर्ड और स्कूल की दाखिला कॉपियों में सफेदा (व्हाइटनर) लगाकर ढीमर (केवट) जाति को बदलकर विशेष पिछड़ी जनजाति ‘बैगा’ दर्ज करा लिया. इस जालसाजी के दम पर जिले में 250 से ज्यादा फर्जी सर्टिफिकेट जारी करा लिए गए, जिसके सहारे 70 से अधिक लोग वर्तमान में अलग-अलग सरकारी विभागों में नौकरी हासिल कर ऐश कर रहे हैं.

स्कूल रिकॉर्ड में फेरबदल और सफेदा लगाकर ओबीसी को बना दिया एसटी

इस पूरे रैकेट ने फर्जीवाड़े के लिए सबसे आसान रास्ता स्कूल के दस्तावेजों को चुना. आरोपियों ने प्राथमिक स्कूलों के पुराने दाखिल-खारिज रजिस्टरों में छेड़छाड़ की. मूल रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत आने वाले ढीमर समाज के लोगों के नाम के आगे सफेदा लगाया गया और वहां पेन से ‘बैगा’ लिख दिया गया. मजेदार बात यह है कि इन सभी परिवारों के राजस्व रिकॉर्ड, पुराने मिशल अभिलेख, वोटर आईडी और पैतृक जमीनों के कागजातों में आज भी इनकी मूल जाति ढीमर ही दर्ज है. इस तरह एक सुनियोजित साजिश के तहत पूरी की पूरी ओबीसी आबादी को कागजों पर अनुसूचित जनजाति (ST) घोषित कर दिया गया.

पिता की जाति ढीमर और बेटा बन गया विशेष संरक्षित बैगा आदिवासी

जांच में जो शुरुआती दस्तावेज और शिकायतें सामने आई हैं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं. कई परिवारों में सरकारी कागजों के भीतर ऐसी विसंगतियां देखने को मिली हैं जहां घर के मुखिया यानी पिता की वास्तविक जाति ढीमर दर्ज है, जबकि उसके सगे बेटे का सरकारी परमानेंट सर्टिफिकेट विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा के नाम पर जारी हुआ है. इतना ही नहीं, कुछ सरकारी कर्मचारियों के सर्विस रिकॉर्ड में पत्नी की जाति तो एसटी दर्ज है लेकिन उसके पति का रिकॉर्ड ओबीसी वर्ग का है. इस तरह के विरोधाभासों के बाद भी तहसील और एसडीएम दफ्तरों से बिना किसी कड़े भौतिक सत्यापन के धड़ाधड़ प्रमाण पत्र बांटे जाते रहे.

मूल निवास मस्तूरी का और सर्टिफिकेट जारी करा लिया पेंड्रारोड से

फर्जीवाड़ा करने वाले ये सभी लोग मुख्य रूप से बिलासपुर जिले की मस्तूरी तहसील के ग्राम पोड़ी और सीपत क्षेत्र के रहने वाले हैं. नियमानुसार इनका जाति प्रमाण पत्र मस्तूरी एसडीएम दफ्तर से जारी होना चाहिए था, लेकिन वहां पकड़े जाने के डर से आरोपियों ने बिलासपुर और पेंड्रारोड एसडीएम कार्यालय से संपर्क साधा. अफसरों से सांठगांठ कर सभी ने अपने दस्तावेजों में बिलासपुर शहर के इमलीपारा का फर्जी अस्थाई पता दर्ज कराया. साल 2015 से पहले के जितने भी संदिग्ध प्रमाण पत्र मिले हैं, उन सभी में इमलीपारा का पता लिखा है और उन पर फर्जी सील व हस्ताक्षर होने की बात भी सामने आ रही है.

समाज के रसूखदार पदाधिकारी ही निकले इस पूरे रैकेट के मास्टरमाइंड

सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे संगठित गिरोह का संचालन करने वाले कोई और नहीं बल्कि ढीमर (केवट) समाज के ही कुछ स्थानीय पदाधिकारी हैं. समाज के तत्कालीन अध्यक्ष और सचिव ने अपने करीबियों, रिश्तेदारों, दामाद, बहू और बेटियों को सरकारी नौकरी दिलाने का लालच देकर यह पूरा ताना-बाना बुना था. जालसाजी का यह दायरा सिर्फ बिलासपुर के कोटा और मस्तूरी ब्लॉक तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके तार रतनपुर और बेलगहना के दर्जनों गांवों तक फैल गए. वर्तमान में इस फर्जी सर्टिफिकेट की बदौलत कई लोग सरकारी विभागों में शिक्षाकर्मी, पटवारी, पुलिसकर्मी और यहां तक कि डॉक्टर बनकर सेवाएं दे रहे हैं.

जब विधानसभा में आदिमजाति मंत्री ने माना कि मस्तूरी में बैगा रहते ही नहीं

छत्तीसगढ़ की भौगोलिक और सामाजिक संरचना के अनुसार, बैगा बेहद संवेदनशील और विशेष संरक्षित आदिम जनजाति समूह है, जिनकी सीधी भर्ती के लिए विशेष छूट के नियम हैं. 2011 की सरकारी जनगणना के मुताबिक पूरे छत्तीसगढ़ में बैगा आदिवासियों की आबादी महज 89,744 के करीब है, जो कवर्धा और बिलासपुर के पहाड़ी मैकल रेंज के कुछ खास इलाकों में ही निवास करती है. खुद राज्य के आदिमजाति कल्याण मंत्री ने पूर्व में विधानसभा में एक सवाल के जवाब में लिखित रूप से यह स्वीकार किया था कि मस्तूरी मैदानी इलाका है और वहां बैगा जनजाति का कोई प्राकृतिक अस्तित्व या बसाहट नहीं है.

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के कड़े आदेश के बाद खुली प्रशासन की नींद

यह पूरा गंभीर मामला इतने सालों तक फाइलों में दबा रहा और स्थानीय स्तर पर की गई शिकायतें कचरे के डिब्बे में फेंक दी गईं. जिला प्रशासन के सुस्त रवैये को देखते हुए स्थानीय जागरूक नागरिकों ने सीधे दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में याचिका दायर की. आयोग ने मामले को बेहद गंभीर मानते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को सख्त अल्टीमेटम जारी किया, जिसके बाद राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति हरकत में आई. आयोग के कड़े निर्देश के बाद अब बिलासपुर जिला प्रशासन ने एक विशेष जांच टीम का गठन कर इन सभी 250 से अधिक संदिग्ध प्रमाण पत्रों के सत्यापन की फाइलें खोली हैं.

जमीन और नौकरी के इस महाघोटाले की एसआईटी या सीबीआई जांच की मांग तेज

13 जून 2026 को बिलासपुर संभागायुक्त सुनील कुमार जैन ने बताया कि मामले की आधिकारिक शिकायत मिल चुकी है और सभी संबंधित विभागों को जांच के लिए पत्र जारी कर दिया गया है. दूसरी तरफ, छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग ने इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे एक बड़ा आपराधिक सिंडिकेट करार दिया है और सरकार से विशेष जांच दल (SIT) या सीबीआई (CBI) से जांच कराने की अनुशंसा की है. आयोग को आशंका है कि इन फर्जी प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल न केवल सरकारी नौकरियां पाने के लिए किया गया, बल्कि भविष्य में असली आदिवासियों की जमीनों को कौड़ियों के भाव खरीदने और कब्जा करने के लिए भी किया जा रहा था.

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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