
मातर तिहार छत्तीसगढ़ की यादव जाति में धूमधाम से मनाया जाने वाला त्योहार है। यह दिवाली के ठीक तीसरे दिन होता है, उसी दिन जब पूरे भारत में भैया दूज मनाया जाता है। इस दिन घरों में गाय–बछड़ा का पूजन किया जाता है और साथ ही बड़े मेले का आयोजन होता है।

कब मनाया जाता है?
छत्तीसगढ़ में मातर तिहार हर साल दिवाली के तीन दिन बाद मनाया जाता है। दिवाली के बाद जिस दिन भाई दूज होता है, उसी दिन मातर तिहार का उत्सव है। वर्ष 2025 में यह दिन 23 अक्टूबर (गुरुवार) को है।

कैसे मनाया जाता है?
इस दिन यादव जाति के परिवारों में विशेष तैयारी की जाती है। गाय और बछड़े को नहलाकर साफ-सफाई कर भोजन खिलाया जाता है। उसके बाद विधिपूर्वक उनकी पूजा होती है। पूजा के बाद वही भोजन पूरे परिवार को बांटा जाता है।

दिनभर त्योहार की रौनक बढ़ जाती है क्योंकि गांव में मातर मड़ई का आयोजन होता है। मड़ई में राउत नाचे-गाए, लोकनृत्य दिखाते हैं, गीत बजाते हैं और आपस में मिलजुल कर खुशियाँ मनाते हैं। कुछ जगहों पर लोग पारंपरिक हथियारों से कला प्रदर्शन विभिन्न करतब दिखाया जाता है इसके साथ ही गाय बैलों के समूह के बीच परंपरानुसार कुम्हाडा ढुलाई भी करते हैं कुम्हाडा ढुलाई का मतलब पशुधन की पूजा कर आखरा बेताल की पूजा कर कुम्हाडा अर्थात कद्दू को गाय बैलों के पैर से तुड़वाया जाता है और उसे मातर मड़ई में आए गांव के लोगों को प्रसाद के रूप में वितरण किया जाता है।
त्योहार की सामाजिक अहमियत
मातर तिहार सिर्फ पूजा-पाठ या अनुष्ठान नहीं है। यह त्योहार सामाजिक मेल-जोल का अवसर है। यह जाति-समुदाय के लोगों को एक साथ लाता है। नृत्य-नाटिका और मड़ई की भागीदारी से लोग अपनी संस्कृति को जीवित रखते हैं। एवं पशुधन केई पूजा कर इस मनाते है तरह मातर तिहार स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक बंधन को मजबूत करता है।



