
छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव पर बिलासपुर हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। प्रदेश के 5,000 से अधिक स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था न होने पर चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने इस स्थिति को ‘सिस्टम की नाकामी’ करार देते हुए कहा कि बार-बार निर्देश देने के बावजूद जमीन पर हालात नहीं बदल रहे हैं। कोर्ट ने साफ किया कि बेटियों को गरिमा के साथ शिक्षा पाने का अधिकार है और सुविधाओं की कमी के कारण उन्हें स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर करना पूरी तरह अस्वीकार्य है।
शर्मनाक आंकड़े: 56 हजार स्कूलों में से हजारों के पास बुनियादी सुविधा नहीं
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यू-डीआइएसई (U-DISE) की एक रिपोर्ट पेश की गई, जिसने सरकारी दावों की पोल खोल दी है। आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के कुल 56,615 स्कूलों में से हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां छात्राओं के लिए अलग शौचालय ही नहीं हैं। कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर चिंता जताते हुए कहा कि यह स्थिति शर्मनाक है। बुनियादी सुविधाओं की इस कमी के कारण बड़ी संख्या में छात्राएं अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ रही हैं (ड्रॉपआउट), जो प्रदेश के भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
यूरिन इन्फेक्शन का डर: शौचालय न होने से छात्राओं और शिक्षिकाओं की सेहत खतरे में
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं पर भी गंभीर टिप्पणी की। डिवीजन बेंच ने कहा कि स्कूलों में टॉयलेट की अनुपस्थिति या उनकी बदहाली के कारण छात्राओं और महिला शिक्षकों में यूरिन इन्फेक्शन जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। प्रदेश के करीब 8,000 स्कूलों में बने हुए शौचालय इतने खराब हैं कि वे इस्तेमाल करने लायक ही नहीं बचे हैं। कई जगहों पर टॉयलेट कबाड़ में तब्दील हो चुके हैं, जिससे वहां जाने में भी खतरा बना रहता है।
बिलासपुर का हाल बुरा: 160 स्कूलों में टॉयलेट गायब, 200 से ज्यादा जर्जर
राजधानी रायपुर के बाद न्यायधानी बिलासपुर के स्कूलों की स्थिति भी चिंताजनक है। ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, अकेले बिलासपुर जिले के ही 160 से अधिक स्कूलों में शौचालय की भारी कमी है। वहीं, 200 से ज्यादा स्कूलों में बने हुए शौचालय देखरेख के अभाव में खंडहर बन चुके हैं। कोर्ट ने पूछा कि जब जिले के मुख्य केंद्रों का यह हाल है, तो अंदरूनी और वनांचल क्षेत्रों की स्थिति क्या होगी? विभाग को अब इन जर्जर शौचालयों की मरम्मत और नए निर्माण का पूरा हिसाब देना होगा।
शिक्षा सचिव तलब: 23 मार्च तक शपथ पत्र के साथ मांगी विस्तृत रिपोर्ट
अदालत ने इस पूरी लापरवाही को ‘प्रणालीगत विफलता’ मानते हुए स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया है। कोर्ट ने सचिव को अगली सुनवाई, जो 23 मार्च 2026 को निर्धारित है, से पहले एक विस्तृत रिपोर्ट और शपथ पत्र पेश करने का आदेश दिया है। विभाग को यह बताना होगा कि अब तक इन स्कूलों में सुविधाओं का विस्तार क्यों नहीं किया गया और जो बजट आवंटित हुआ था, उसका इस्तेमाल कहां हुआ।
19.54 लाख छात्राओं का सवाल: क्या दांव पर लगा है बेटियों का भविष्य?
छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में करीब 19.54 लाख छात्राएं शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। सरकारी आंकड़ों की मानें तो केवल 52,545 स्कूलों में ही लड़कियों के लिए क्रियाशील (Working) शौचालय उपलब्ध हैं। यानी एक बड़ी आबादी आज भी अपने बुनियादी हक से वंचित है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कागजी आंकड़ों के बजाय अब धरातल पर काम दिखना चाहिए। अदालत ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए संकेत दिए हैं कि लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर अब सीधी गाज गिर सकती है।
आर-पार की लड़ाई: बदहाली दूर करने के लिए हाईकोर्ट का अल्टीमेटम
जनवरी 2025 में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अब इस मुद्दे पर आर-पार की लड़ाई का मूड बना लिया है। कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले की तब तक निगरानी जारी रखेगी जब तक कि हर स्कूल में बेटियों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ शौचालय सुनिश्चित नहीं हो जाते। शिक्षा विभाग को अब युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है, ताकि स्कूलों से छात्राओं का पलायन रुक सके और उन्हें एक स्वस्थ वातावरण मिल सके।



