
भारतीय भक्ति परंपरा और समाज सुधार के इतिहास में माता कर्मा का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे केवल साहू समाज की आराध्य देवी ही नहीं, बल्कि नारी शक्ति और निस्वार्थ भक्ति का जीवंत उदाहरण हैं। हाल ही में उनकी 1009वीं जयंती के अवसर पर भारतीय डाक विभाग द्वारा डाक टिकट जारी करना उनकी वैश्विक प्रतिष्ठा को दर्शाता है। छत्तीसगढ़ से लेकर ओडिशा और राजस्थान तक माता कर्मा की महिमा लोकगीतों और कथाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुँची है। 11वीं शताब्दी में जन्मी इस महान संत ने रूढ़िवादिता और छुआछूत जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाकर समाज को समरसता का पाठ पढ़ाया।
भक्ति का बाल्यकाल: झांसी की गलियों से कृष्ण प्रेम की शुरुआत
माता कर्मा का जन्म संवत 1073 (सन 1016) में उत्तर प्रदेश के झांसी नगर में एक प्रतिष्ठित तेली व्यवसायी रामशाह और लीलावती के घर हुआ था। बचपन से ही कर्मा का मन खेल-कूद से अधिक भगवान श्री कृष्ण की कथाओं में रमता था। लोककथाओं के अनुसार, मात्र 10 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी डूबती सहेली की जान बचाकर और कृष्ण के स्मरण से उसे होश में लाकर अपने तपोबल का परिचय दिया था। उनके माता-पिता के धार्मिक संस्कारों ने उन्हें निडर और सेवाभावी बनाया, जो आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का मुख्य आधार बना।

नरवरगढ़ का संकट: जब राजा के अहंकार के सामने ढाल बनीं माता
युवावस्था में कर्मा का विवाह नरवरगढ़ (वर्तमान मध्य प्रदेश) के व्यवसायी चतुर्भुज शाह के साथ हुआ। उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब वहां के राजा ने हाथी की बीमारी ठीक करने के नाम पर सभी तेल व्यापारियों को अपना पूरा तेल एक कुंड में डालने का अविवेकपूर्ण आदेश दे दिया। इससे पूरा समाज आर्थिक बर्बादी की कगार पर था। तब माता कर्मा ने कृष्ण का आह्वान किया और उनके पात्र से निकला थोड़ा सा तेल देखते ही देखते विशाल कुंड को लबालब भर गया। इस घटना ने शासक के अन्याय के खिलाफ जनता में साहस भर दिया।
संघर्ष और पलायन: अत्याचारी शासन का त्याग कर राजस्थान की ओर
राजा के शोषणकारी रवैये से दुखी होकर माता कर्मा ने अन्याय के आगे झुकने के बजाय उस राज्य का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। उनके नेतृत्व में नरवरगढ़ के समस्त तैलिक परिवारों ने राजस्थान की ओर पलायन किया और वहां नए सिरे से अपनी पहचान बनाई। इसी दौरान पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद उन्होंने सती होने का विचार किया, किंतु ईश्वरीय प्रेरणा और गर्भस्थ शिशु की रक्षा के लिए उन्होंने लोक कल्याण का मार्ग चुना। उन्होंने अपने बच्चों को सुयोग्य बनाया और सांसारिक जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद पूरी तरह भक्ति को समर्पित हो गईं।
जगन्नाथ पुरी की यात्रा: नगरी-सिहावा से राजिम तक का पावन प्रवास
अपने पुत्रों को व्यवसाय सौंपकर माता कर्मा मुट्ठी भर चावल-दाल लेकर जगन्नाथ पुरी की पदयात्रा पर निकल पड़ीं। छत्तीसगढ़ के नगरी-सिहावा और राजिम में उनके प्रवास की आज भी गहरी मान्यता है। राजिम में महानदी के तट पर उन्होंने सारथी समाज के बीच समय बिताया और उन्हें भक्ति का संदेश दिया। आज भी राजिम में भाद्रपद शुक्ल एकादशी से 11 दिवसीय ‘कर्मा महोत्सव’ मनाया जाता है। उनकी स्मृति में करमसेनी वृक्ष की पूजा की परंपरा आज भी छत्तीसगढ़ी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।
भगवान और भक्त का नाता: जब स्वयं श्री कृष्ण ने स्वीकार की खिचड़ी
पूरी पहुँचने पर जब मंदिर के पुजारियों ने माता कर्मा के साधारण वेशभूषा को देखकर उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं दिया, तो वे समुद्र तट पर अपनी कुटिया बनाकर रहने लगीं। वहां वे प्रतिदिन मिट्टी के बर्तन में खिचड़ी पकाकर बाल कृष्ण को पुकारती थीं। मान्यता है कि साक्षात जगन्नाथ प्रभु बाल रूप में उनकी कुटिया में आकर उनके हाथों से खिचड़ी खाते थे। एक बार जब पुजारी ने मंदिर के पट खोले, तो भगवान के मुख पर खिचड़ी के अंश लगे मिले, जिससे उनकी अनन्य भक्ति का चमत्कार पूरी दुनिया के सामने प्रकट हुआ।

ऐतिहासिक परंपरा: जगन्नाथ मंदिर में आज भी लगता है खिचड़ी का भोग
माता कर्मा की भक्ति का ही प्रताप है कि आज भी ओडिशा के जगन्नाथ पुरी मंदिर में सुबह का सबसे पहला प्रसाद माता कर्माबाई की ‘खिचड़ी’ के रूप में ही लगाया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और भक्तों के बीच अटूट विश्वास का केंद्र है। माता ने अपने जीवन के अंतिम 4 वर्ष पुरी में ही बिताए और चैत्र शुक्ल एकम (सन 1064) को ज्योति स्वरूप होकर भगवान में समाहित हो गईं। उनकी यह कथा सिखाती है कि ईश्वर भाव के भूखे होते हैं, विधि-विधान के नहीं।
समाज सुधार की मशाल: ऊंच-नीच और आडंबरों पर करारा प्रहार
माता कर्मा केवल एक भक्त नहीं, बल्कि एक प्रखर समाज सुधारक भी थीं। उन्होंने उस दौर में महिलाओं को शिक्षित और सशक्त बनाने पर जोर दिया जब सामाजिक बंदिशें बहुत अधिक थीं। उन्होंने छुआछूत और धार्मिक पाखंड का विरोध किया और समाज को संगठित होकर रहने की प्रेरणा दी। उनके प्रयासों के कारण ही आज छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कर्मा जयंती के दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाता है और सामूहिक विवाह जैसे आयोजनों के माध्यम से सामाजिक एकता को बढ़ावा दिया जाता है।
माता कर्मा की विरासत: छत्तीसगढ़ी संस्कृति का गौरवशाली हिस्सा
आज के दौर में माता कर्मा की जीवनी और उनके सिद्धांत करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। छत्तीसगढ़ में साहू समाज द्वारा आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों में बिना किसी भेदभाव के सभी जातियों के लोग शामिल होते हैं, जो माता के ‘समरस समाज’ के सपने को सच करता है। उन पर आधारित फिल्में और लोकगीत आज भी युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। भक्त शिरोमणि माता कर्मा का जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति और जनकल्याण का मार्ग ही मनुष्य को अमरत्व प्रदान करता है।



