जग्गी हत्याकांड में बड़ा उलटफेर: अमित जोगी को उम्रकैद की सजा, हाईकोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला

छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित राजनीतिक हत्याकांड ‘रामावतार जग्गी मर्डर केस’ में बिलासपुर हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने निचली अदालत के पुराने आदेश को बदलते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को दोषी करार दिया है। कोर्ट ने अमित जोगी को हत्या और आपराधिक साजिश रचने के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इस फैसले के बाद प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि लगभग दो दशक पुराने इस मामले में मुख्य आरोपी को पहली बार सजा मिली है।

ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द: हाईकोर्ट ने सीबीआई की अपील को दी मंजूरी

बिलासपुर हाईकोर्ट ने सीबीआई द्वारा दायर की गई अपील (ACQA No. 66/2026) पर सुनवाई करते हुए माना कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण था। साल 2007 में रायपुर की विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए अमित जोगी को बरी कर दिया था, जबकि अन्य 28 आरोपियों को उम्रकैद दी गई थी। हाईकोर्ट ने अपने ताजा फैसले में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि एक ही गवाही और सबूतों के आधार पर कुछ लोगों को सजा देना और मुख्य साजिशकर्ता को छोड़ देना पूरी तरह गलत है।

उम्रकैद और जुर्माना: दोषी अमित जोगी को अब काटनी होगी जेल की सजा

अदालत ने अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 120-बी (साजिश रचना) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई है। इसके साथ ही उन पर 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। यदि जुर्माना अदा नहीं किया जाता, तो उन्हें 6 महीने की अतिरिक्त सश्रम कारावास की सजा भुगतनी होगी। हाईकोर्ट का यह फैसला उन 28 अन्य दोषियों की सजा को भी बरकरार रखता है, जो पहले से ही जेल की सजा काट रहे हैं या इस मामले में संलिप्त पाए गए थे।


क्या था रामावतार जग्गी हत्याकांड: 4 जून 2003 की वो खौफनाक रात

यह पूरा मामला 4 जून 2003 का है, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कद्दावर नेता रामावतार जग्गी की सरेराह गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की सरकार थी। जग्गी पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी और एनसीपी के कोषाध्यक्ष थे। इस हाई-प्रोफाइल मर्डर ने पूरे देश का ध्यान खींचा था। मामले में कुल 31 आरोपी बनाए गए थे, जिनमें से दो सरकारी गवाह बन गए थे। अमित जोगी को छोड़कर बाकी सभी को 2007 में ही सजा मिल गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के दखल से खुला केस: सतीश जग्गी की लंबी कानूनी लड़ाई

रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने अपने पिता को न्याय दिलाने के लिए लंबी कानूनी जंग लड़ी। अमित जोगी के बरी होने के खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि बीच में इस मामले पर स्टे लगा रहा, लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही यह मामला दोबारा खोला गया और सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेजा गया। सतीश जग्गी का शुरू से आरोप था कि राजनीतिक रसूख के कारण मुख्य आरोपी को बचाया गया था, जिसे अब हाईकोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी है।


कौन-कौन थे शामिल: याह्या ढेबर और फिरोज सिद्दीकी समेत 28 दोषी

इस मामले में रायपुर के कई रसूखदार नाम शामिल थे। दोषियों की सूची में चिमन सिंह, याह्या ढेबर, अभय गोयल, फिरोज सिद्दीकी, वीके पांडे और राकेश चंद्र त्रिवेदी जैसे नाम शामिल हैं। पुलिस और सीबीआई की जांच में सामने आया था कि जग्गी की हत्या एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी। हाईकोर्ट ने इन सभी की भूमिका को फिर से परखते हुए माना कि साजिश के तार अमित जोगी से जुड़े हुए थे। इस मामले में दोषी पाए गए कई लोग अब भी जेल में अपनी सजा काट रहे हैं।

छत्तीसगढ़ की राजनीति पर असर: पूर्व सीएम परिवार की बढ़ी मुश्किलें

अमित जोगी छत्तीसगढ़ की क्षेत्रीय पार्टी ‘जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़’ (जेसीसीजे) के प्रमुख हैं। हाईकोर्ट के इस फैसले का असर उनके राजनीतिक भविष्य पर पड़ना तय है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उम्रकैद की सजा के बाद उनकी सदस्यता और चुनाव लड़ने की पात्रता पर भी संकट आ सकता है। जोगी परिवार के लिए यह एक बड़ा कानूनी झटका है, क्योंकि वे पहले से ही जाति प्रमाण पत्र और अन्य विवादों को लेकर अदालती चक्कर लगा रहे हैं। अब देखना होगा कि अमित जोगी इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में क्या कदम उठाते हैं।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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