
Chhath Puja 2025: लोकपर्व छठ पूजा या सूर्यषष्ठी व्रत आज सिर्फ बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह देश-विदेश के उन सभी स्थानों पर मनाया जाता है, जहां इन राज्यों के लोग बस गए हैं। हालांकि यह भारत के सबसे प्राचीन और पवित्र व्रतों में से एक है, फिर भी बहुत से लोग इसके उद्देश्य, कथा और विधि के बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते।

1. छठ या सूर्यषष्ठी व्रत में किन देवी-देवताओं की पूजा होती है?
इस व्रत में भगवान सूर्य और षष्ठी देवी (छठ मैया) की पूजा की जाती है।
सूर्य देवता प्रत्यक्ष देवता हैं, जो सभी जीवों को जीवन देते हैं। षष्ठी देवी को संतान की रक्षक और दीर्घायु प्रदाता माना जाता है।
इस अवसर पर सूर्य की पत्नियां उषा और प्रत्युषा को भी अर्घ्य देकर प्रसन्न किया जाता है।
2. छठ मैया कौन हैं?
षष्ठी देवी सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी का छठा अंश मानी जाती हैं।
उन्हें ब्रह्मा की मानसपुत्री और कुछ पुराणों में कात्यायनी देवी कहा गया है।
नवरात्रि की षष्ठी तिथि को भी इनकी पूजा की जाती है। स्थानीय बोली में इन्हें ही छठ मैया कहा जाता है, जो निःसंतानों को संतान और संतानों को सुरक्षा प्रदान करती हैं।

3. षष्ठी देवी की पूजा की शुरुआत कैसे हुई?
पुराणों के अनुसार, राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी को संतान नहीं थी।
महर्षि कश्यप की सलाह पर उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ किया।
रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन वह मृत पैदा हुआ। तभी एक दिव्य देवी (षष्ठी देवी) प्रकट हुईं और उस बालक को जीवित कर दिया। राजा ने प्रसन्न होकर देवी की स्तुति की तभी से षष्ठी पूजन की परंपरा प्रारंभ हुई।
4. सूर्य की पूजा का उल्लेख कहां मिलता है?
वेदों और पुराणों में सूर्य पूजा का विशेष स्थान है।
- हनुमान जी ने सूर्य को ही अपना गुरु बनाया था।
- श्रीराम ने रावण से युद्ध से पहले आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ कर सूर्य की आराधना की थी।
- सांब, श्रीकृष्ण के पुत्र, ने सूर्य की उपासना से कुष्ठ रोग से मुक्ति पाई थी।
सूर्य पूजा का इतिहास वैदिक काल से भी पहले का है।

5. सनातन धर्म में सूर्य का स्थान क्या है?
सूर्य देवता पंचदेवों में एक हैं गणेश, दुर्गा, शिव, विष्णु और सूर्य।
मत्स्य पुराण में कहा गया है कि इन पांचों देवताओं की पूजा सबसे पहले करनी चाहिए।
6. सूर्य पूजा के क्या लाभ बताए गए हैं?
भगवान सूर्य आयु, आरोग्य, संतान, धन-धान्य, यश और तेज प्रदान करते हैं।
उनकी उपासना करने वाला व्यक्ति रोग, दुख और दरिद्रता से मुक्त होता है।
सूर्य को ब्रह्म का तेज माना गया है वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के दाता हैं।
7. सूर्य पूजा नदी या तालाब के किनारे ही क्यों की जाती है?
छठ में सूर्य को जल से अर्घ्य देने की परंपरा है।
पवित्र नदियों या तालाबों के जल से स्नान और अर्घ्य देने का विशेष महत्त्व बताया गया है।
हालांकि पूजा किसी स्वच्छ स्थान या घर के आंगन में भी की जा सकती है।
8. भीड़ से बचते हुए छठ कैसे किया जा सकता है?
आजकल बहुत से लोग घर में ही छठ पूजा करने लगे हैं।
कहा गया है “मन चंगा तो कठौती में गंगा।”
घर की छत या आंगन में भी स्वच्छ स्थान बनाकर पूजा की जा सकती है, जिससे भीड़ से बचा जा सके।
9. महिलाएं ही छठ व्रत अधिक क्यों करती हैं?
महिलाएं परिवार के सुख, समृद्धि और संतान की दीर्घायु के लिए यह व्रत करती हैं।
यह उनके त्याग और तपस्या की भावना का प्रतीक है।
हालांकि पुरुष भी इस व्रत को कर सकते हैं यह व्रत सभी के लिए समान है।
10. क्या यह पूजा सभी जातियों और वर्गों के लिए है?
हाँ, छठ पूजा में कोई जातिगत या सामाजिक भेदभाव नहीं है।
सूर्य देवता सब पर समान कृपा करते हैं।
हर समाज, जाति और वर्ग के लोग मिल-जुलकर इस पूजा में भाग लेते हैं।
11. इस पूजा में कौन-सा सामाजिक संदेश छिपा है?
छठ पूजा में डूबते और उगते दोनों सूर्य की पूजा की जाती है यह जीवन के हर चरण में समान सम्मान देने का प्रतीक है।
इस पर्व में जातिगत भेदभाव नहीं होता;
यह समानता, एकता और सामाजिक समरसता का संदेश देता है।
छठ में प्रयोग होने वाले सूप और डाले सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों द्वारा बनाए जाते हैं, जो समानता का प्रतीक है।
12. बिहार से छठ पूजा का विशेष संबंध क्यों है?
बिहार में सूर्य और षष्ठी देवी की पूजा की परंपरा सदियों पुरानी है।
यहां सूर्यपुत्र कर्ण की जन्मभूमि होने के कारण सूर्य पूजा का विशेष महत्व है।
सूर्य पुराण में बिहार के कई देव मंदिरों का वर्णन मिलता है इसलिए छठ बिहार की आस्था का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है।
13. देव सूर्य मंदिर (बिहार) की विशेषता क्या है?
देव का सूर्य मंदिर अनोखा है क्योंकि इसका मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर है, जबकि सामान्यतः सूर्य मंदिर पूर्वमुखी होते हैं।
मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण देव शिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।
इसकी वास्तुकला अत्यंत सुंदर और अद्वितीय मानी जाती है।
14. छठ पूजा साल में कब-कब की जाती है?
मुख्य छठ पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष में होती है।
इसके अलावा चैत्र शुक्ल पक्ष में भी यह व्रत किया जाता है, जिसे चैती छठ कहा जाता है।
15. कुछ लोग पूजा स्थल तक लेटकर क्यों जाते हैं?
इसे आम भाषा में ‘कष्टी देना’ कहा जाता है।
ऐसा प्रायः तब किया जाता है जब किसी ने मन्नत मांगी हो।
यह व्रती की श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है।

16. छठ पूजा के चारों दिनों में क्या-क्या होता है?
- पहला दिन – नहाय-खाय (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी):
इस दिन व्रती शुद्ध होकर स्नान करते हैं और चावल-दाल व कद्दू की सब्जी का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
यह आने वाले उपवास के लिए शरीर को तैयार करता है। - दूसरा दिन – खरना (कार्तिक शुक्ल पंचमी):
शाम को गन्ने के रस या गुड़ की खीर का प्रसाद बनाया जाता है।
पूजा के बाद यह प्रसाद घर-परिवार और पड़ोसियों में बांटा जाता है। - तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य (कार्तिक शुक्ल षष्ठी):
अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। घाटों पर या घर के आंगन में सभी भक्त डूबते सूर्य की आराधना करते हैं। - चौथा दिन – उषा अर्घ्य और पारण (कार्तिक शुक्ल सप्तमी):
उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
इसके साथ ही चार दिन का यह पवित्र पर्व संपन्न होता है।
छठ पूजा का सार
छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन, समर्पण और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
यह पर्व प्रकृति और सूर्य की आराधना के माध्यम से मानव और पर्यावरण के बीच गहरे संबंध की याद दिलाता है।
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