
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के समीप बसा सिटोंगा गांव अपने एक प्राचीन और अनोखे आयोजन के लिए जाना जाता है। हर साल नागपंचमी के अवसर पर यहां खेतों के बीच स्थित नागदेवता के छोटे से मंदिर में विशाल नाग दरबार सजता है। इस दरबार में आसपास के क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय लोग बांकी और श्री नदियों को नाग व नागिन के रूप में पूजते हैं। प्रकृति और लोक मान्यताओं से जुड़े इस स्थान को लेकर क्षेत्र में गहरी आस्था है।
सौतेली मां के अत्याचार से जुड़ी है सिटोंगा नाग दरबार की पौराणिक कहानी
Jashpur Sitonga Nag Darbar: मंदिर के पुजारी लहरू बाबा के अनुसार, यहां स्थापित मूर्तियां बांकी और श्री नाम के दो भाई-बहन की हैं। प्रचलित लोककथा के अनुसार, दोनों बेहद गरीब परिवार से थे और अपनी सौतेली मां के व्यवहार से परेशान रहते थे। एक दिन उनकी मां ने उन्हें भूखे-प्यासे ही खेत की रखवाली के लिए भेज दिया। खेत में भूख से परेशान होकर दोनों बच्चों ने वहां पड़े सांप के दो अंडों को पकाकर खा लिया, जिसके बाद उनका शरीर सर्प रूप में बदलने लगा।
कुंड में छिपने और नदियों के उद्गम से जुड़ी है गांव की लोककथा
कहा जाता है कि सर्प रूप धारण करने के बाद दोनों बच्चे खेत में बने एक कुंड में जाकर छिप गए। जब माता-पिता उन्हें ढूंढते हुए खेत पहुंचे, तो डर के मारे बांकी पश्चिम की ओर और श्री पूर्व की ओर भाग निकली। जनश्रुति है कि उनके अलग-अलग दिशाओं में जाने से बांकी और श्री नदी का उद्गम हुआ। इसी मान्यता के कारण आज भी स्थानीय लोग इन दोनों नदियों को भाई-बहन का रूप मानकर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।
नागपंचमी पर श्रद्धालुओं पर नागदेवता के सवार होने की है मान्यता
सिटोंगा के नाग दरबार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नागपंचमी के दिन पूजा-अर्चना शुरू होते ही कई श्रद्धालुओं के शरीर में नागदेवता का प्रवेश माना जाता है। इस दौरान कुछ श्रद्धालु जमीन पर रेंगने और नागों जैसी मुद्राएं बनाने लगते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि यह नागदेवता की कृपा का ही एक रूप है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
पवित्र कुंड में स्नान और दूध पिलाने के बाद शांत होते हैं श्रद्धालु
जब श्रद्धालुओं के शरीर पर नागदेव का प्रवेश माना जाता है, तब उन्हें नदी के पास बने पवित्र कुंड में ले जाकर स्नान कराया जाता है। इसके बाद उन्हें दूध पिलाया जाता है, जिसके बाद वे धीरे-धीरे सामान्य अवस्था में आते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को देखने के लिए नागपंचमी के दिन मंदिर परिसर में पैर रखने की जगह नहीं होती है।
छत्तीसगढ़ के दूर-दराज इलाकों से पहुंचते हैं श्रद्धालु, बनी रहती है गहरी आस्था
सिटोंगा का यह नाग दरबार केवल धार्मिक अनुष्ठान का केंद्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की लोक संस्कृति का प्रमुख हिस्सा है। नागपंचमी पर लगने वाले इस मेले में लोग अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं। स्थानीय प्रशासन और पुलिस व्यवस्था के बीच ग्रामीण इस परंपरा को वर्षों से पूरी निष्ठा के साथ निभाते आ रहे हैं।



