हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: चुनाव याचिका से कांग्रेस का नाम हटाने की हाईकोर्ट की अनुमति, अब सिर्फ विधायक बालेश्वर साहू के खिलाफ चलेगा मामला

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने जैजैपुर विधायक बालेश्वर साहू के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका पर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने आदेश दिया है कि इस चुनाव याचिका से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नाम हटा दिया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951’ के तहत किसी भी चुनाव याचिका में राजनीतिक दल को अनिवार्य पक्षकार बनाने की आवश्यकता नहीं है। इस फैसले के बाद अब कांग्रेस संगठन को इस कानूनी लड़ाई से राहत मिल गई है, हालांकि विधायक बालेश्वर साहू के खिलाफ केस पहले की तरह चलता रहेगा।

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आपराधिक रिकॉर्ड छिपाने का है मामला: जैजैपुर के निर्वाचित विधायक की जीत को दी गई है चुनौती, सोशल मीडिया पर जानकारी न देने का आरोप

यह पूरा मामला जैजैपुर विधानसभा क्षेत्र के चुनावी नतीजों से जुड़ा है। क्षेत्र के मतदाता सरोज चंद्रा और दिगंबर साहू ने याचिका दायर कर विधायक बालेश्वर साहू के निर्वाचन को शून्य घोषित करने की मांग की है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि विधायक ने नामांकन के दौरान अपने आपराधिक इतिहास की जानकारी को सार्वजनिक करने में कोताही बरती। उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के सख्त निर्देश हैं कि हर उम्मीदवार को अपने पुराने केसों की जानकारी अखबारों और सोशल मीडिया पर साझा करनी होगी। आरोप है कि विधायक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर यह जानकारी नहीं दी, जो नियमों का सीधा उल्लंघन है।

पार्टी को क्यों बनाया गया था पक्षकार: याचिकाकर्ताओं ने दी थी जवाबदेही की दलील, कहा- दल की भी है जिम्मेदारी

याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों ने तर्क दिया था कि उम्मीदवारों के चयन और उनके रिकॉर्ड की पारदर्शिता के लिए राजनीतिक दल भी उतने ही जिम्मेदार हैं। उनकी दलील थी कि अगर कोई उम्मीदवार जानकारी छिपाता है, तो संबंधित पार्टी को भी इसका हिस्सा माना जाना चाहिए। इसी आधार पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और प्रदेश कांग्रेस कमेटी को याचिका में प्रतिवादी बनाया गया था। हालांकि, कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संदीप दुबे ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि चुनाव याचिका केवल व्यक्तिगत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के खिलाफ होती है, न कि पूरे संगठन के खिलाफ।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 82 का उल्लेख: हाईकोर्ट ने बताया कौन हो सकता है पक्षकार, दलों के लिए नहीं है कोई प्रावधान

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कानून की स्पष्ट व्याख्या की है। अदालत ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 82 का जिक्र करते हुए कहा कि इस धारा में उन लोगों की सूची दी गई है जिन्हें चुनाव याचिका में पक्षकार बनाना जरूरी है। इस सूची में केवल चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों का नाम होता है। चूंकि राजनीतिक दल खुद चुनाव नहीं लड़ते बल्कि उम्मीदवारों को सिंबल देते हैं, इसलिए उन्हें चुनाव याचिका में शामिल करना कानूनी रूप से सही नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने कांग्रेस का नाम हटाने का आवेदन स्वीकार कर लिया।

मानहानि की कार्यवाही संभव, लेकिन चुनाव याचिका में शामिल करना अनिवार्य नहीं

अदालत ने स्वीकार किया कि सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के संबंध में कड़े निर्देश दिए हैं। यदि कोई दल इनका उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ अवमानना या मानहानि जैसी कार्यवाही की जा सकती है। लेकिन हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि इन निर्देशों का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि उन्हें हर चुनाव याचिका में पक्षकार बना लिया जाए। कोर्ट ने कहा कि चुनाव याचिका की प्रकृति और दायरा बहुत सीमित होता है, जिसमें केवल चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति की पात्रता की जांच की जाती है।

एक सप्ताह के भीतर करना होगा संशोधन, 20 जनवरी को होगी अगली सुनवाई

अदालत ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया है कि वे एक सप्ताह के भीतर अपनी याचिका में सुधार करें और कांग्रेस का नाम हटाकर नया ड्राफ्ट पेश करें। इस प्रक्रिया के बाद अब पूरा मामला केवल बालेश्वर साहू के व्यक्तिगत आचरण और उनके द्वारा दी गई जानकारियों तक ही सीमित रह जाएगा।

महत्वपूर्ण तिथिघटनाक्रम
07 जनवरी 2026हाईकोर्ट द्वारा कांग्रेस का नाम हटाने का आदेश
14 जनवरी 2026याचिका में संशोधन करने की समय सीमा
20 जनवरी 2026मामले की अगली सुनवाई की तारीख

सोशल मीडिया बनाम नियम: चुनाव आयोग के सर्कुलर का उल्लंघन बना आधार, क्या निरस्त होगा निर्वाचन?

याचिका में मुख्य मुद्दा चुनाव आयोग के उस सर्कुलर को बनाया गया है, जिसमें उम्मीदवारों के लिए अखबारों के साथ-साथ फेसबुक, एक्स (ट्विटर) और अन्य सोशल मीडिया हैंडल्स पर अपने मुकदमों की जानकारी देना अनिवार्य किया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विधायक ने केवल अखबारों में औपचारिकता पूरी की। अब हाईकोर्ट को यह तय करना है कि क्या सोशल मीडिया पर जानकारी न देना इतना बड़ा तकनीकी आधार है कि किसी की जीत को रद्द कर दिया जाए। बालेश्वर साहू पहले ही ठगी के मामले में न्यायिक रिमांड पर हैं, ऐसे में यह याचिका उनके राजनैतिक भविष्य के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।

सियासी गलियारों में चर्चा तेज: विधायक की गिरफ्तारी के बाद बढ़ी मुश्किलें, अब कोर्ट के फैसले पर टिकी सबकी नजर

कांग्रेस विधायक बालेश्वर साहू पहले ही बैंक धोखाधड़ी के मामले में जेल में हैं और अब चुनाव याचिका में हाईकोर्ट के इस रुख ने मामले को और दिलचस्प बना दिया है। हालांकि कांग्रेस पार्टी इस केस से बाहर हो गई है, लेकिन विधायक के लिए मुश्किल अभी कम नहीं हुई है। 20 जनवरी को होने वाली सुनवाई में चुनाव आयोग और विधायक बालेश्वर साहू की ओर से पेश किए जाने वाले जवाब इस केस की दिशा तय करेंगे। जैजैपुर की जनता और प्रदेश की राजनीति अब इस कानूनी लड़ाई के परिणाम का बेसब्री से इंतजार कर रही है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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