
Bakrid: इस्लाम धर्म का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार ईद-उल-अजहा यानी बकरीद अब बेहद करीब है। देश भर में इस साल 27 या 28 मई 2026 को कुर्बानी का यह पर्व मनाया जा सकता है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक, यह त्योहार ज़ुल हिज्जा महीने की 10 तारीख को मनाया जाता है। माना जा रहा है कि 17 या 18 मई को ज़ुल हिज्जा का चांद नजर आ सकता है, जिसके ठीक बाद बकरीद की अंतिम तारीख का औपचारिक ऐलान हो जाएगा। चांद का दीदार होते ही मुस्लिम समुदाय में त्योहार की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, लेकिन इसके साथ ही कुछ खास धार्मिक नियमों और पाबंदियों का दौर भी शुरू हो जाता है।
पैगंबर इब्राहिम की याद में दी जाती है कुर्बानी, तीन हिस्सों में बंटता है गोश्त
बकरीद का यह पर्व मुख्य रूप से त्याग, समर्पण और पैगंबर इब्राहिम की महान कुर्बानी की याद में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पैगंबर इब्राहिम ने अल्लाह के हुक्म पर अपनी सबसे अजीज चीज यानी अपने बेटे तक को कुर्बान करने का फैसला कर लिया था। उनकी इसी अटूट आस्था को याद करते हुए बकरीद के दिन बकरे, भेड़ या अन्य हलाल जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। इस कुर्बानी के गोश्त को बराबर तीन हिस्सों में बांटने का नियम है, जिसमें से एक हिस्सा अपने परिवार के लिए, दूसरा सगे-संबंधियों के लिए और तीसरा हिस्सा गरीब व जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए रखा जाता है।
ज़ुल हिज्जा के शुरुआती 10 दिन बेहद पवित्र, बाल-नाखून न काटने की है परंपरा
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, ज़ुल हिज्जा महीने के शुरुआती 10 दिन इबादत के लिहाज से सबसे ज्यादा मुकद्दस (पवित्र) माने जाते हैं। इन दिनों में किए गए अच्छे कामों और प्रार्थनाओं का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। इसी महीने में दुनिया भर के मुसलमान हज यात्रा के लिए मक्का भी पहुंचते हैं। इन 10 दिनों के लिए एक विशेष नियम यह है कि जो भी व्यक्ति अपने घर में कुर्बानी कराने का इरादा रखता है, वह चांद दिखने के बाद से लेकर कुर्बानी होने तक अपने शरीर के बाल और नाखून नहीं काटता है।
हदीस में मिलता है इसका जिक्र, मोहम्मद साहब ने दी थी यह सीख
कुर्बानी से पहले बाल और नाखून न काटने का यह तरीका पैगंबर मोहम्मद साहब के कथनों और हदीसों पर आधारित है। उलेमा (धार्मिक विद्वान) बताते हैं कि हदीस में साफ तौर पर इस बात का उल्लेख मिलता है कि जैसे ही ज़ुल हिज्जा का चांद नजर आए, कुर्बानी करने वाले व्यक्ति को अपने बाल और नाखून काटने से परहेज करना चाहिए। जब ईद के दिन ईदगाह की नमाज के बाद जानवर की कुर्बानी मुकम्मल हो जाती है, उसके बाद ही वे अपने बाल या नाखून काट सकते हैं।
हाजियों की तरह सादगी अपनाने का संदेश, गलती होने पर भी कबूल होती है कुर्बानी
इस परंपरा के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा हुआ है। जानकार बताते हैं कि जो लोग किन्हीं कारणों से मक्का जाकर हज नहीं कर पाते, वे इस नियम का पालन करके मक्का में मौजूद हाजियों की तरह सादगी और आत्म-संयम का अहसास करते हैं। यह नियम इंसान को अनुशासन और सब्र सिखाता है। हालांकि, यह नियम पूरी तरह अनिवार्य (फर्ज) नहीं है, बल्कि इसे ‘मुस्तहब’ यानी एक पसंदीदा और बेहतर अमल माना गया है। अगर कोई व्यक्ति भूलवश या अनजाने में इस दौरान अपने बाल या नाखून काट लेता है, तो भी उसकी कुर्बानी पूरी तरह मान्य रहती है और उस पर कोई धार्मिक दोष नहीं आता।



